हिन्दी है हमारी स्वाभिमान की भाषा
हिंदी कविताहिन्दी है हमारी स्वाभिमान की भाषा
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कविता का संसार गीतों ने संसार रचायाहंसी-खुशी के ताल संग।अलंकारों की झंकार मेंनाचता है छमछम छंद।। नायिका के ख्वाब सजानेनायक चाँद-सितारे लायानदिया गीत सुहाने गायेगूंजे निर्झर कलकल नाद दुःख -सुख की अजब रंगोलीविरह-मिलन की गमगीनीडूब-उबरते जाने कितने प्रेमीप्रीत के सागर में।। रंगमंच के इस खेले मेंनवरस में डूबे चारणकभी ओज में शब्द गूंजतेकभी भक्ति में
अकड़ पर कविता जीवन के इस उम्र तकना जाने कितने मुर्दे देखे। कितनो को नहलाया तैयार भी कियाऔर पाया केवल अकड़सचमुच मुर्दो में अकड़ होती है लेकिन जीते जी इंसान क्यूं दिखाते है अकड़ क्या वे मुर्दे के समान है या यही उनकी पहचान हैमरना तो सब को हैफिर अकड़ अभी से क्यूं?? जियो जी
शिक्षा रोजगार पर कविता शिक्षा की महिमा अति भारी।जन मन में करती उजियारी।ज्ञान प्रकाश हृदय भर देती।मन के सकल तमस हर लेती।।1।। विविध विषय के बनकर ज्ञाता।बनकर अपने भाग्य विधाता।।युवा कर्म पथ बढते जाते।अनुसंधान सफल हो पाते।।2।। रोजगार से शिक्षा जुड़ती।मानो गंध स्वर्ण में भरती।।बढे सृजन पथ युवा शक्ति जब।जग मंगल के कार्य सधे तब।।3।।
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अब गरल है जिंदगी. शौक कहाँ साहेब,तब जरूरतें होती थीं,रुपया बड़ा,आदमी छोटा,पूरी न होने वाली हसरतें होती थीं!मिठाइयों से तब सजते नहीं थे बाज़ार,आये जब कोई,पर्व-त्योहार,पकवानों से महकता घर,भरा होता माँ का प्यार! तब आसमान में जहाज देखआँगन में सब दौड़ आते ,आज हर बच्चा उड़ रहा है,पानी में कागज की नाँव?अचरज कर रहा है!
हरियाली पर कविता एक वृक्ष सौ पुत्र समान|जंगल वसुधा की शान||पर्यावरण सुरक्षित कर |धरती का रखें सम्मान|| स्वच्छ परिवेश बनाना है|पेड़ अधिक लगाना है ||हरितमा बनीं धरा को |धानीं चुनर पहनानाहै|| हरियाली चहुं ओर आयी|ठंडी हवा बही सुखदायी||धरा बनीं है आज दुल्हन|कारी बदरी गगन पर छायी|| पंछी उड़े उन्नत गगन |जैसे पायल की छनछन||पंखो को
नमन तुम्हें है राष्ट्रभाषा नमन तुम्हें है राष्ट्रभाषानमन तुम्हें से मातृभाषाजीवंत तुम्हें अब रहना हैपुष्पों के जैसे खिलना है। अंग्रेजों ने था अस्तित्व मिटायाहिन्दी भाषा को मृत बनायाअपनी भाषा का परचम लहरायाहमारी भाषा को हमसे किया पराया। आजा़दी के बाद भी हिन्दीसंविधान में मौन पड़ी हैद्वितीय भाषा का कलंक झेलतीअंग्रेजी प्रथम स्थान पर खड़ी है।
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निराला प्रकृति निराला रूप प्रकृति का , लगता है चितचोर।भाये मन को ये सदा , करता भाव विभोर।।करता भाव विभोर , सभी को खूब लुभाता।फैला चारों ओर , मनुज दोहन करवाता ।।रखना ‘मधु’ यह ध्यान , बनें हम नहीं निवाला।प्रकृति का रहे साथ , करें कुछ काम निराला।। मधुसिंघी नागपुर (महाराष्ट्र)
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कैसे गीत लिखूं अब मैं कैसे गीत लिखूंकैसे प्रीत की रीत लिखूं ना कोई संगी ना कोई साथीजैसे तेल बिन जले है बाती कैसे प्रीत की रीत लिखूं.. ना कोई मेल ना है मिलापफिर क्यों बिछोह का है आलाप अब कैसे मैं गीत लिखूं.. इक बस तेरा ही सहारा था बसहर पल संग तेरे ,गंवारा
हिन्दी का शृंगार आ सजनी संग बैठआज तुझे शृंगार दूँमेरी प्रिय सखी हिंदीमैं तुझको संवार दूँ । कुंतिल अलकों के बीचऊषा की सजा कर लालिमा,मुकलित कलियों की वेणीजूड़े के ऊपर टांग दूँ।आ सजनी..। ईश वंदन बेंदी शीशफूलपावन स्तुतियों के कर्ण फूल,अरुण बिंदु सजा भालगहन तम का अंजन सार दूँ।आ सजनी..।नथनी पे सजा दूँ तेरेसद्भावों के
हिन्दी हमारी जान है हिन्दी हैं हम..हिन्दी हमारी जान है, हम सबकी जुबान है !! रग-रग में बहता लहू ही है, ये हर हृदय की तान है!! हिन्दी हैं हम..हिन्दी हमारी जान है!! अपने में समाहित कर लेगी..हो शब्द किसी..भाषा का कोई..समरस भाव से स्वीकारे…अपनी संतान को ज्यों माता कोई! यही हमारी मान है …ये
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हिन्दी हमारी शान हिन्दी न केवल बोली भाषा, ये हमारी शान है।मातृभाषा है हमारी, ये बड़ी महान है।।……..चमकते तारे आसमां के , हैं भारत के वासी हम।कोई चंद्र है कोई रवि, कोई यहां भी है न कम।।आसमां बनकर सदा, हिन्दी मेरी पहचान है।हिन्दी न केवल बोली भाषा , ये