कविता बहार

जिंदगी एक पतंग – आशीष कुमार

हिंदी कविता

जिंदगी एक पतंग – आशीष कुमार उड़ती पतंग जैसी थी जिंदगीसबके जलन की शिकार हो गईजैसे ही बना मैं कटी पतंगमुझे लूटने के लिए मार हो गई सबकी इच्छा पूरी की मैंनेमेरी इच्छा बेकार हो गईकहने को तो आसमान की ऊँचाईयाँ मापी मैंनेचलो मेरी ना सही सबकी इच्छा साकार हो गई ऐसा भी ना था

जिंदगी एक पतंग – आशीष कुमार Read More »

दोपहर पर कविता – राजेश पांडेय वत्स

हिंदी कविता

दोपहर पर कविता (छंद -कवित्त ) तपन प्रचंड मुख खोजे हिमखंड अब, असह्य जलती धरादेखे मुँह फाड़ के! धूप के थप्पड़ मार पड़े गड़बड़ बड़े, पापड़ भी सेक देते पत्थर पहाड़ के! खौल खौल जाते घरबार जग हाहाकार, सिर थाम बैठे सबदुनिया बिगाड़ के! आहार विहार रघुनाथ मेरे ठीक रखें, अब तो भुगत वत्स सृष्टि

दोपहर पर कविता – राजेश पांडेय वत्स Read More »

मुख पर कविता – राजेश पांडेय वत्स

हिंदी कविता

मुख पर कविता -मनहरण घनाक्षरी गैया बोली शुभ शुभ, सुबह से रात तक,कौआ बोली हितकारी,चपल जासूस के! हाथी मुख चिंघाड़े हैं, शुभ मानो गजानन,सियार के मुख कहे,बोली चापलूस के! मीठे स्वर कोयल के, बसंत में मधु घोले,तोता कहे राम राम,मिर्ची रस चूस के! राम के भजन बिन, मुख किस काम आये,वत्स कहे ब्यर्थ अंग,खाये मात्र

मुख पर कविता – राजेश पांडेय वत्स Read More »

चिड़िया पर बालगीत – साधना मिश्रा

हिंदी कविता

चिड़िया पर बालगीत – चुनमुन और चिड़िया चुनमुन पूछे चिड़िया रानी, छुपकर कहाँ तुम रहती हो?मेरे अंगना आती न तुम, मुझसे क्यों शर्माती हो? नाराज हो मुझसे तुम क्यों? दूर – दूर क्यों रहती हो?आओ खेलें खेल- खिलौने, डरकर क्यों छुप जाती हो? चिड़िया उदास होकर बोली, मेरा घर बर्बाद किया।बाग – बगीचे काट-काटकर, अपना

चिड़िया पर बालगीत – साधना मिश्रा Read More »

रसोईघर पर कविता – राजेश पांडेय वत्स

हिंदी कविता

रसोईघर पर कविता (छंद-मनहरण घनाक्षरी) अँगीठी माचीस काठ,कंडा चूल्हा और राख, गोरसी सिगड़ी भट्टी, *देवता रसोई के!* सिल बट्टा झाँपी चक्की,मथनी चलनी चौकी,कड़ाही तसला तवा, *वस्तु कोई-कोई के!* केतली कटोरा कुप्पी,बर्तन मूसल पीढ़ा, गिलास चम्मच थाली, *रखे सब धोई के!* मटका सुराही घड़ा,ढक्कन चम्मच बड़ा, कोना बाल्टी सजा वत्स, *भवन नंदोई के!* -राजेश पाण्डेय वत्स

रसोईघर पर कविता – राजेश पांडेय वत्स Read More »

1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 1 May International Labor Day

मजदूर की दशा पर हास्य व्यंग्य – मोहम्मद अलीम

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस या मई दिन मनाने की शुरूआत 1 मई 1886 से मानी जाती है जब अमेरिका की मज़दूर यूनियनों नें काम का समय 8 घंटे से ज़्यादा न रखे जाने के लिए हड़ताल की थी। किसी भी समाज, देश, संस्था और उद्योग में मज़दूरों, कामगारों और मेहनतकशों की अहम भूमिका होती है।

मजदूर की दशा पर हास्य व्यंग्य – मोहम्मद अलीम Read More »

मेरा साथी कौन- दीप्ता नीमा

हिंदी कविता

मेरा साथी कौन- दीप्ता नीमा एक दिन मुझे भगवान् मिलेमैंने उनसे पूछा कि भगवन्आप मुझे बताएं कि मेरा साथी कौन? मैं राही मेरी मंजिल है कौन मैं पंछी मेरा घोसला है कौनमैं तूफान मेरा साहिल है कौनमैं हूँ नाव मेरा नाविक है कौनमैं इठलाती नदिया मेरा सागर है कौन मैं वनफूल मेरा वनमाली है कौन

मेरा साथी कौन- दीप्ता नीमा Read More »

असाध्य वीणा – अज्ञेय की कविता

हिंदी कविता

असाध्य वीणा अज्ञेय जी की एक लम्बी कविता है। इस कविता की रचना उन्होंने सनˎ1957-58 के जापान प्रवास के बाद 18-20 जून 1961 में अल्मोड़ा के कॉटेज में 321 पंक्ति वाली यह लंबी कविता लिखी थी। यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘आँगन के पार द्वार’ में संकलित है, जो 1961 में ही प्रकाशित हुआ था।

असाध्य वीणा – अज्ञेय की कविता Read More »

आतंकवाद विरोधी दिवस पर कविता – एकता गुप्ता

महत्वपूर्ण दिन आधारित कविता, हिंदी कविता

21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या के बाद ही 21 मई को आतंकवाद विरोधी दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया गया। इस दिन हर सरकारी कार्यालयों, सरकारी उपक्रमों और अन्य सरकारी संस्थानों में आतंकवाद विरोधी शपथ दिलाई जाती है। आतंकवाद विरोधी दिवस पर कविता -मत

आतंकवाद विरोधी दिवस पर कविता – एकता गुप्ता Read More »

धर्म की कृत्रिमता पर कविता-नरेंद्र कुमार कुलमित्र

प्रकृति और पर्यावरण

धर्म की कृत्रिमता पर कविता कृत्रिम होती जा रही है हमारी प्रकृति-03.03.22—————————————————-हिंदू और मुसलमान दोनों कोठंड में खिली गुनगुनी धूप अच्छी लगती हैचिलचिलाती धूप से उपजी लू के थपेड़ेदोनों ही सहन नहीं कर पाते हिंदू और मुसलमान दोनोंठंडी हवा के झोंकों से झूम उठते हैंतेज आंधी की रफ्तार दोनों ही सहन नहीं कर पाते हिंदू

धर्म की कृत्रिमता पर कविता-नरेंद्र कुमार कुलमित्र Read More »

क्या यही है “आस्था – शशि मित्तल “अमर”

हिंदी कविता

आस्था धूम मची है,जय माता की… मंदिरों, पंडालों में, लगी है भीड़ भक्तों की.. क्या यही है “आस्था “? मन सशंकित है मेरा, वृद्धाश्रम में दिखती माताएँ… जो जनती हैं एक “वजूद”रचती हैं सृष्टि… थक जाती हैं तब, निकाल दी जाती हैं, एक अनंत अंधकार की ओर… कन्या भोजन, भंडारे का आयोजन!! पूजी जाती कन्याएं…

क्या यही है “आस्था – शशि मित्तल “अमर” Read More »

चैत्र मास संवत्सर / परमानंददास

हिंदी कविता

चैत्र मास संवत्सर परिवा बरस प्रवेस भयो है आज।कुंज महल बैठे पिय प्यारी लालन पहरे नौतन साज॥१॥आपुही कुसुम हार गुहि लीने क्रीडा करत लाल मन भावत।बीरी देत दास परमानंद हरखि निरखि जस गावत॥२॥

चैत्र मास संवत्सर / परमानंददास Read More »

Scroll to Top