हिंदी कविता

जीत से पहले पूछो—तुम क्या जीत रहे हो?

हिंदी कविता

जीत से पहले पूछो—तुम क्या जीत रहे हो? हर जीतसफलता नहीं होती।अगर लक्ष्य ही मूर्खतापूर्ण हो,तो तेज़ी से पहुँचना भीकोई गौरव नहीं। भीड़ को खुश करने के लिएदौड़ना,अंधी चाह के पीछेभागना—यह कर्म नहीं,भटकाव है। पहले जानो—तुम कौन हो,और तुम्हें सच में चाहिए क्या। क्योंकिगलत युद्ध में मिली जीतहार से भी बदतर होती है। यह मत

जीत से पहले पूछो—तुम क्या जीत रहे हो? Read More »

“असुरक्षा की गोद में गपशप”

हिंदी कविता

“असुरक्षा की गोद में गपशप” गपशपएक आग हैजिसमें सच नहीं जलता,डर सुलगता है।दो लोग फुसफुसाते हैं—तीसरा जुड़ जाता है,फिर चौथा,फिर भीड़।कोई सवाल नहीं पूछता—क्यों?किसलिए?यहाँ जुड़ावअर्थ से नहीं बनता,शोर से बनता है।मैं भी बोल दूँकुछ भी—तो मैं भी हूँ।मैं भी अपना हूँ।यही प्रमाण हैइस झूठे परिवार का।सन्नाटा डराता है,क्योंकि सन्नाटे मेंमैं हूँ—नंगा,अकेला,बिना सहारे।इसलिए लोगशब्द उछालते हैंजैसे

“असुरक्षा की गोद में गपशप” Read More »

जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ

हिंदी कविता

जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ सबसे कठोर सज़ा यह नहीं कितुम खुद को दंड दो—सबसे कठोर सज़ा है कहना:मैं वैसा बना नहीं रहूँगा। सज़ाबदला नहीं होती।सज़ासुधार है। जो दंडसिर्फ पीड़ा दे,पर दृष्टि न खोले—वह न्याय नहीं,अहंकार का अभिनय है। असल दंडघटना पर नहीं पड़ता।क्षण पर नहीं।कर्म पर भी नहीं। वह पड़ता हैकरने वाले

जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ Read More »

आनंद — सबसे कठिन सुख

हिंदी कविता

आनंद — सबसे कठिन सुख(Joy: The Hardest Pleasure) आनंदसाधारण सुख नहीं है।वह ऊपर उठाता है—और इसलिएकठिन है। सस्ते सुखआसानी से मिल जाते हैं।खुद को बेचो,नशे में डूबो,भूल जाओ—कुछ ही पल में। ये सुखतुम्हें नहीं उठाते,तुम्हें घटाते हैं। पर बिना सुखजीवन भी नहीं चलता।तो चुनाव करो—नीचे गिरने का,या ऊपर उठने का। ऊँचा सुखमाँगता है—संयम,सजगता,बुद्धि,और समर्पण। इसीलिएअधिकांश

आनंद — सबसे कठिन सुख Read More »

“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना”

हिंदी कविता

“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना” दुनिया बीमार है—यह कोई खबर नहीं,यह पृष्ठभूमि है।अख़बार, स्क्रीन, बाज़ार,तालियाँ, नारे,सब एक ही ज्वर में काँपते हैं। हर तरफ़महत्वाकांक्षा की खाँसी,ईर्ष्या का बुख़ार,लालच की उलटी,और इसे“सफलता” कहा जाता है। जो तुम देखते हो,वही तुम बनते हो।जो तुम्हारा समय खाता है,वही तुम्हें निगलता है।जो मन में बैठ जाता है,वही मालिक हो

“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना” Read More »

अंदर की आग, बाहर की राख

हिंदी कविता

अंदर की आग, बाहर की राख जंगल जल रहे हैं—पर यहसिर्फ पेड़ों की आग नहीं है। यह मन की आग हैजो दिखाई देने लगी है। धरती के जंगलऔर मनुष्य का मन—दो अलग त्रासदियाँ नहीं।दोनोंएक ही आग मेंभस्म हो रहे हैं। यह आगभूख है।लालच है।झूठी पहचानों कीअंतहीन जलन है। पूरा होने की चाह मेंमनुष्य नेदुनिया को

अंदर की आग, बाहर की राख Read More »

तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं

हिंदी कविता

तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं मन में उठने वालीकोई भी लहरअकेली नहीं उठती।मन दुनिया से बना है,और दुनियामन से। आतंकी का लक्ष्य—मारना। एक का लक्ष्य—मंदिर।दूसरे का—मस्जिद। मक्खी का लक्ष्य—गंदगी। हार्मोन से चलती देह का लक्ष्य—भोग। लालची मन का लक्ष्य—पैसा। ऊबे हुए मन का लक्ष्य—मनोरंजन। निर्भर मन का लक्ष्य—स्वीकृति। असुरक्षित मन का लक्ष्य—सहारा। तो मनआख़िर पीछा किसका

तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं Read More »

“हर अपराध चीखता नहीं”

हिंदी कविता

“हर अपराध चीखता नहीं” हर अपराधअख़बार में नहीं आता,कुछरोज़मर्रा की हवा मेंघुलकरऔरत की साँसों में उतर जाते हैं। शादी के बादकाम करने की मनाही—कोई शोर नहीं। दफ़्तर मेंछेड़छाड़—“चलता है” कहकरफाइल बंद। प्रसव में मौत—एक आँकड़ा। रात की सड़क—उसके लिए नहीं। उसका शरीर—उसकी पहचान।तालियाँ बजती हैं। नेतृत्व में उसकी कमी—किसे फ़ुर्सत है सोचने की? फिर एक

“हर अपराध चीखता नहीं” Read More »

इतने होशियार कि विवेक खो बैठे

हिंदी कविता

इतने होशियार कि विवेक खो बैठे डर और लालच से चलीचतुराई—मूर्खता का हीदूसरा नाम है। निरर्थक कामों मेंहम कितने सफल हैं!खुद को खुश करने के लिएहमेशाकोई रास्ता निकाल लेते हैं। चूहे की तरह—घर में घुसने काछेद जानते हैं।और अगर न हो,तोखुद खोद लेते हैं। हमारी सारी होशियारीछोटी-छोटीलालसाओं के लिएआरक्षित है। क्या हम मूर्ख हैं?नहीं। बेकार

इतने होशियार कि विवेक खो बैठे Read More »

लत का अंतिम इलाज

हिंदी कविता

लत का अंतिम इलाज लतकोई बीमारी नहीं,एक खाली जगह हैजो शोर मचाती है। तुम लौटते हो—बार-बार—क्योंकिवहाँ कुछ मिलता है।झूठा सही,पर मिलता तो है। अगर कुछ न मिलता,तो तुम जाते ही क्यों? टीवी दोषी नहीं।मोबाइल दोषी नहीं।पोर्न, पैसा, नशा—कुछ भी दोषी नहीं। दोषतुम्हारी ज़रूरत है। एक भीतर कारोता हुआ गड्ढा,जो कहता है—“कुछ दो…कुछ भी दो।” तुम

लत का अंतिम इलाज Read More »

पवित्र असंतोष”

हिंदी कविता

पवित्र असंतोष” जीवन एक है—इसलिएठहरना अपराध है। हम हालात सेसमझौता कर लेते हैं,क्योंकि वेपहचाने हुए होते हैं,सही इसलिए नहीं। जहाँ गिरा दिया गया,वहींघर बना लिया। लोग कहते हैं—तनाव है,व्यवस्था खराब है,दुनिया कठिन है। पर भीतरएक आराम छुपा है—गलत जीवन काआराम। दुख है,पर जाना नहीं चाहते। सच्चा असंतोषशिकायत नहीं करता,वहरूपांतरण माँगता है। वह कहता है—यह जीवनमेरी

पवित्र असंतोष” Read More »

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा?

हिंदी कविता

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा? तुम अपने बारे मेंजो सोचते हो—क्या वहीवास्तव मेंतुम हो? हम अहंकार कोअकड़ समझ लेते हैं।किसी का सीना तना देखकह देते हैं—इसे अहंकार है। पर अहंकारइतना सतही नहीं। अहंकार है—“मैं हूँ।” औरजिसके साथतुम इस “मैं हूँ” कोजोड़ देते हो,वहीअहंकार बन जाता है। “मैं महान हूँ”—अहंकार।“मैं कमजोर हूँ”—अहंकार। “मैं पीड़ित

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा? Read More »

Scroll to Top