हिंदी कविता

सुख से परे

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सुख से परे जीवन का उद्देश्यसुख नहीं है,सुख पाने कीबेचैनी से मुक्ति है। पैसा?सफलता?खुशी?इतने छोटे लक्ष्यइतने विशाल जीवन के लिए—कितनी अजीब सौदेबाज़ी। जिस सुख कोतुम जानते हो,वह सिखाया गया है,पालित है,क्षणिक उत्तेजना कानाम बदल दिया गया है। और वहदुख के बिनाजी ही नहीं सकता। सुख चाहिएतो पहले दुख चाहिए—गहरा सुख चाहिएतो गहरा दुख चाहिए।यही हैखुशी

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“पशु होकर जन्म, पर उठने के लिए बने

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“पशु होकर जन्म, पर उठने के लिए बने” शरीरपशु से मिलता है—भूख,डर,संरक्षण की चाह। यह स्वाभाविक है। पर मन भीअगरयहीं अटक जाए—तो प्रश्न उठता है। पशुईर्ष्या करता है—इलाका बचाने के लिए। पशुधोखा देता है—जीने के लिए। पशुहिंसा करता है—खतरे में। यह जंगल का नियम है। अब अपने भीतर देखो—क्यारोज़ी कमाने के लिएईर्ष्या ज़रूरी है? क्यासाँस

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मैं तृप्त हूँ या नहीं—किसे परवाह है!

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मैं तृप्त हूँ या नहीं—किसे परवाह है! अशांति है—अशांति है—अशांति है। फिरएक दिनसाहस करकेमैंनेअशांति को देखा। वहाँकुछ महान नहीं था।बसछोटी-छोटी माँगें,नाज़ुक इच्छाएँ,अहम् कीथकी हुई पुकार। और उसी क्षणअशांति कीसेवा करने कीज़रूरत खत्म हो गई। जबखुद की बेचैनीकेंद्र नहीं रहती,तोकुछ बड़ाजगह लेने लगता है। कोई कारण,कोई काम,कोई सत्य—जोइतना ध्यान माँगता हैकिअपने बारे मेंसोचने काअवकाश ही नहीं

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पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो

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पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो भूख पेट में नहीं,मन में रहती है।अंधी, बेचैन,कभी न भरने वाली—और उसी नेसब कुछ खा लिया। तुम गलत जीकरसही उपभोग कीआशा कैसे करते हो? धरती से रिश्तातुम्हारे जीवन जैसा है—टूटा हुआ,अचेत,लालची। सही जीवनकिसी नीति से नहीं,जागरूकता से शुरू होता है। जीवित होनासचेत होना है।और सचेत होनाखुद को जानना

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एक-दूसरे की ओर नहीं, ऊपर की ओर

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“एक-दूसरे की ओर नहीं, ऊपर की ओर” संबंध काएक ही सवाल है—वह तुम्हेंउसकी ओर खींचता है,यातुम्हारी ऊँचाई की ओर? अगर उसकी मौजूदगी मेंतुमउसके मूड केचक्कर काटते हो,उसकी स्वीकृति केइंतज़ार में रहते हो—तो वह प्रेम नहीं,आश्रितता है। जो तुम्हेंअपनी पहली प्राथमिकताबनाना चाहता है,पर तुम्हारेविकास की चिंता नहीं करता—वहसाथी नहीं,केंद्र बनना चाहता है। साधारण प्रेम मेंएक चुप

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क्या जीवन सच में शुरू भी हुआ है?

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क्या जीवन सच में शुरू भी हुआ है? यदि तुमघड़ी के बोझ तले दबे हो,घंटों के गुलाम हो—तो यहतुम्हारे उद्देश्य परआरोप है। जिस काम कासही कारण होता है—जो बाहर से नहीं,भीतर की स्पष्टता सेजन्म लेता है—उसमेंसमय गिना नहीं जाता। पढ़ते हुए,काम करते हुए,यहाँ तक किसाँस लेते हुए भी—घड़ीचुप हो जाती है। और यदि तुम युवा

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इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो

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इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो इच्छा अपराध नहीं है।आकर्षण पतन नहीं है।गलती चाहने में नहीं,गलती उस दिशा में हैजहाँ तुम चाह रहे हो। इच्छा आग है—उसी आग सेदीपक जलता है,उसी से घर भी जलते हैं। समस्या यह नहींकि तुम दौड़ते हो,समस्या यह हैकि तुम किसके पीछे दौड़ते हो। तुम मृगमरीचिका सेप्यास बुझाना चाहते हो,छाया

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समस्या तकनीक नहीं, तुम हो

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“समस्या तकनीक नहीं, तुम हो” तकनीकन निर्दोष है,न अपराधी—वहबस औज़ार है। विनाशखरीदने वाले में है। अंधा उपभोगधरती को नहीं,पहलेमन कोखोखला करता है। और जब तकउपभोक्ताजागता नहीं,खपतरुक नहीं सकती। उपभोक्तासिर्फ़पैसा रखने वाला नहीं,उपभोक्ताअहंकार है—जोखुद को भरनेनिकला है। कानूनप्रगति कोनहीं रोक सकते। जिज्ञासामानव स्वभाव है—हमआगे बढ़ेंगे,खोजेंगे,तोड़ेंगे,बनाएँगे। यह ठीक है। गलती यह हैकि हमारी जिज्ञासाबाहर जाती है,भीतर नहीं।

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खून बहती नाक बेहतर है, खून बहता दिल नहीं

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*खून बहती नाक बेहतर है, खून बहता दिल नहीं** सबसे पहलेलक्ष्य चुनो—और वहयोग्य होना चाहिए। योग्य लक्ष्यआरामदेह नहीं होते।उन्हेंसुविधा देखकरनहीं चुना जाता। डर के बीचसच कहना,कड़वाहट के बीचदयालु बने रहना,शोरगुल मेंभीतरी स्पष्टताढूँढना— इनमें सेकुछ भीआसान नहीं है। जहाँ लक्ष्ययोग्य होगा,वहाँहारें भी होंगी।छोटी-छोटी।बार-बार। उन्हेंज़्यादा अर्थ मत दो। अगरहर छोटी हारतुम्हें तोड़ दे,तोतुम टिक नहीं पाओगे। लज्जा

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पूर्णता नहीं, निरंतरता

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पूर्णता नहीं, निरंतरता पूर्ण होना लक्ष्य नहीं,खड़ा रहना लक्ष्य है।गिरकर भीपीठ न दिखाना—यही जीवन है। लड़ाई शुरू करने से पहलेइतना जान लो—क्या मूल्यवान है,और किसके लिएतुम हार स्वीकार नहीं करोगे। सौ बार गिरो,सही दिशा में गिरो।कीमत चुकानी पड़े—तो चुकाओ।गहराई सस्ती नहीं होती। आसानी मत माँगो।तालियाँ मत चाहो।ईमानदारी का रास्ताआराम के लिए नहीं होता। जब वार

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अच्छी आध्यात्मिकता ही अच्छी अर्थव्यवस्था है

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“अच्छी आध्यात्मिकता ही अच्छी अर्थव्यवस्था है” किसी वस्तु की क़ीमतउसके दाम से नहीं,उस असर से तय होती हैजो वहमन पर छोड़ती है। हम बाहर की चीज़ों सेभीतर की तृप्तिखोजते हैं। पर जबआत्म-बोध नहीं होता,तोमूल्य और मूल्यांकनअलग हो जाते हैं। यहीं सेव्यक्तिगत दुखऔरसामूहिक बर्बादीशुरू होती है। अर्थव्यवस्थाआख़िर है किसके लिए?मनुष्य के लिए। और मनुष्य का कल्याणक्या

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देह मुक्ति पर वीटो लगाएगी

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देह मुक्ति पर वीटो लगाएगी जैसा हैवैसा मत छोड़ दो।धारा के साथ मत बहो। समयतुम्हें नहीं बदलेगा।अनुभवतुम्हें नहीं जगाएगा। चालीस हज़ार साल भीजी लो—तो भीकुछ अपने आपनहीं बदलेगा। हमसुख के इच्छुक हैं,परिश्रम से बचने वाले। किसी को काम कराना होतोइनाम देना पड़ता है।काम न कराना होतोकुछ मत करो। जड़ताहमारीस्वाभाविक सुविधा है। मुक्तिसबसे ऊँची उपलब्धि है—औरसबसे

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