हिंदी कविता

(स्पष्ट को चूक जाना)

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Missing the Obvious(स्पष्ट को चूक जाना)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता) तुमकिसी रहस्य से वंचित नहीं हो—तुमस्पष्ट को हीदेख नहीं रहे। जो ठीकतुम्हारे सामने घट रहा है,वहीनज़र से फिसल जाता है। किसी कोनमस्ते कहना,दफ़्तर तकचलते जाना,किसी कीयूँ ही कही बात—सबतुम्हें बहा ले जाते हैं,बिना प्रतिरोध। घटनाएँतुम्हारी अनुमति के बिनाभीतर घुस आती हैं—और तुमउन्हेंसत्य मान लेते हो।

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अधूरापन का उद्योग”

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“अधूरापन का उद्योग” तुमसे कहा गया—तुम पूरे नहीं हो। इसलिएतुम दौड़े—डिग्रियों के पीछे,पदोन्नतियों के पीछे,रिश्तों,सामानों,सपनों के पीछे। एक खाली जगह भरने,जो शायदकभी थी ही नहीं। इसेप्रेरणा कहा गया। पर यहडर पर पलती है,तुलना पर जीती है,शर्म से बिकती है। पहलेतुम्हें तोड़ा गया,फिरमरहम बेचा गया। कहा गया—देखोफलाँ का बेटा। कहा गया—आदमी के बिनातुम कुछ नहीं। कहा

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अपनी ही मूर्खता पर हँस पाना

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Laughing at Your Own Idiocy(अपनी ही मूर्खता पर हँस पाना)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता) बुद्धिमान बनने कीशुरुआततभी होती है,जबतुम अपनी मूर्खतादेख पाते हो। मनुष्य होने का अर्थसिर्फ़ कोमलता नहीं—इसमेंउन्मादी क्रोध है,अविराम वासना है,बेईमानी कीभयानक खिंचाव है। ये कोई अपवाद नहीं,ये जीवन कीप्राकृतिक शक्तियाँ हैं।वे इसलिए नहीं उठतींकि तुम खराब हो,वे इसलिए उठती हैंक्योंकितुम जीवित हो।

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माता-पिता, पहले स्वयं को उठाओ

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“माता-पिता, पहले स्वयं को उठाओ” बच्चे को सँवारने से पहलेखुद को सँभालो। क्योंकिबच्चातुम्हारे उपदेश से नहीं,तुम्हारी स्थिति सेसीखता है। यदि घर मेंजाग्रत माँ है,जाग्रत पिता है—तोबच्चे के डरबिना समझाएघुल जाते हैं। तुम्हारी उपस्थितिपाठ बन जाती है। पहला कर्तव्यबच्चे को ठीक करना नहीं,खुद कोजगाना है। क्योंकिघायल मनकेवलघाव हीदे सकता है। तुमप्रेम का अभिनय कर सकते हो,परअचेतनहर

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सामूहिक मूर्खता की ताक़त

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सामूहिक मूर्खता की ताक़त(अतुकांत कविता) जब सचमतों से तय होने लगे,समझ लोसच हार चुका है। एक मूर्खहँसी बनता है,लाख मूर्खइतिहास। भीड़गलत कोसही बना देती है,और सही कोख़तरा। झूठअकेला नहीं चलता—वहनारे चाहता है,झंडे चाहता है,तालियाँ चाहता है। सचचुप रहता है,अकेला खड़ा रहता है—बिना मंच,बिना समर्थन। आजमूर्खतागलती नहीं रही,संस्था बन गई है। अबप्रश्न पूछनाअपराध है,सोचनादेशद्रोह। भीड़ कहे—तो

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पवित्र आठ-चरणीय आत्महत्या

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“पवित्र आठ-चरणीय आत्महत्या” तुम भटके नहीं हो—तुम राजमार्ग पर हो।चमकदार,चौड़ा,सुरक्षित।और यहीख़तरा है। जन्म,पढ़ाई,नौकरी,शादी,घर,गाड़ी,बच्चे,झगड़े,थकान,मृत्यु। जीवन नहीं—कन्वेयर बेल्ट। इसेपवित्र कहा गया।क्योंकिसब यही करते हैं। और जोसब करते हैं,उसेकौन सवाल करता है? हम आधे रास्ते पर हैं,फिर भीकहते हैं—“मेरा जीवन अलग है।” अलग कैसे?सड़क वही,ईंधन वही,भीड़ वही। पर उम्मीद—कि मंज़िलअद्भुत होगी। अरबों लोगइसी राह से गुज़रे,सम्मानजनक निराशा मेंडूबे।

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(मरने से पहले जागो)

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Wake Up before You Die(मरने से पहले जागो)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, अतुकांत कविता) हर साँस के साथकुछ जोड़ो मत—कुछ गिराओ। दिन बीतेंतो बोझ बढ़े नहीं,हल्कापन गहरा हो। जीवन का उद्देश्यसंग्रह नहीं है,समझ है। जानकारी नहीं,दृष्टि बढ़नी चाहिए।संपत्ति नहीं,स्वतंत्रता। सच्ची वृद्धिपाने में नहीं,छोड़ने में है। भ्रम छोड़ो,उधार के सपने छोड़ो,उस झूठे “मैं” को छोड़ोजिसे तुमखुद समझ बैठे हो।

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घाव इकट्ठा करना बंद करो

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घाव इकट्ठा करना बंद करो कोई तुम्हेंअंदर से चोट नहीं पहुँचा सकताजब तक तुमउसे अनुमति न दो। लोग चोट पहुँचा सकते हैं,पर नुकसान उतना नहींजितना तुमउसे सीने से लगाकरखुद कर लेते हो। घटना बाहर घटती है,पर तुम उसेपहचान बना लेते हो।यही असली हिंसा है। दुनिया दरवाज़ा खटखटाती है—खरोंचती है,धक्का देती है—पर केंद्र तकवह नहीं पहुँच

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असुरक्षा का परिवार

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असुरक्षा का परिवार गपशपसच का संवाद नहीं,डर की साझेदारी है। कुछ लोग बैठते हैं,शब्द नहीं—खालीपन बाँटते हैं।और अचानकभीड़ बन जाती है। कौन जोड़ता है उन्हें?न विचार,न विवेक,न सत्य—बसनिरर्थकता की गर्माहट। डर अकेले रहने का है,इसलिएशोर में घुल जाते हैं।जो स्वयं से अनजान हैं,वेएक-दूसरे का सहारा बनते हैं। वर्मा भी बोलता है,शर्मा भी,चोपड़ा भी—सब वही।तो मैं

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अतीत ही वर्तमान है

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अतीत ही वर्तमान है अतीतपीछे नहीं रहता—यदि तुमने उससेसीखा नहीं। वह भविष्य बनकरलौट आता है,नए कपड़ों में,नए नाम से। लोग कहते हैं—भूल जाओ।छोड़ दो।केवल वर्तमान में जियो। पर यह ज्ञान नहीं,यह पलायन है—स्वतंत्रता काभेष बदले डर। जिसे तुम“अभी” कहते हो,वह अक्सरबीते हुए काछलावा होता है। वर्तमानकोई नई ज़मीन नहीं—वह अतीत कीछाया है,जो आज परपड़ी हुई

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बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना

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बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना याद रखो—जिसे तुम देखते हो,जिसे तुम पूजते हो,जिसे तुम समय देते हो,अंततःतुम वही बन जाते हो। यह दुनियाबीमारी से अछूती नहीं है।समाचार बीमार हैं,बाज़ार बीमार हैं,मनोरंजन बीमार है,शिक्षा बीमार है,सत्ता बीमार है। यहाँ पीड़ाअपवाद नहीं,पृष्ठभूमि है—हर दिन कीलगातार बजती आवाज़। टीवी खोलो—क्या दिखता है?गहराई?शांति?बोध? नहीं।वही दौड़,वही लालच,वही असुरक्षा,वही तुलना,वही ईर्ष्या—हज़ार

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एक ही भूल सौ बार

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एक ही भूल सौ बार क्या सच मेंकोई नई भूल होती है? ध्यान से देखो—जो आज तुम्हें गिरा रहा है,वही तोपाँच साल पहले भीतुम्हें हराकर गया था। नाम बदल गए,चेहरे बदल गए,परप्रवृत्ति?वह वहीं की वहीं है। गिरने की जगह बदली,समय बदला,बहाना बदला—पर गिरनाक्या कभी बदला? तुम कहते हो—इस बार अलग है।पर क्या सच में?या फिरपुराना

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