तीसरी स्त्री
हिंदी कविता“तीसरी स्त्री” पहली स्त्री—जिसेजीवविज्ञान के नाम परसंस्कारों ने गढ़ा।सिखाया गया—मुस्कराओ,सह लो,सज कर रहो।तुम्हारी कीमततुम्हारे शरीर में है। दूसरी स्त्री—विद्रोही।क्रोधित,तैयार।उसने कहा—मैं भी वही करूँगीजो तुम करते हो।वही कपड़े,वही भाषा,वही दौड़। पर शांति?वह भी नहीं मिली। दासता बदली,पर ढाँचा वही रहा।प्रतिक्रियादोहराव बन गई। और अबतीसरी स्त्री कीसंभावना है। न परंपरा की कैदी,न विद्रोह की नकल। वहन शरीर
