हिंदी कविता

क्या होगा / विनोद सिल्ला

हिंदी कविता

क्या होगा हाथ हाथ को काट रहा है क्या होगा।भाई भाई को बांट रहा है क्या होगा।। कटना बंटना रास रहा है उसको तो,एक एक को छांट रहा है क्या होगा।। शेर  बकरियां एक घाट कैसे पीएं,नाम शेर के घाट रहा है क्या होगा।। खून लगा है छूरी पर भी भाई का,उस छूरी को चाट […]

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अंग्रेजी नववर्ष अभिनंदन / आचार्य गोपाल जी

नारी जीवन और संवेदना

अंग्रेजी नववर्ष अभिनंदन १.कहें चौबीस अलविदा, स्वागत है नववर्ष|मंगल मोद मना रहे़ं , है प्रतीक्षा सहर्ष ||है प्रतीक्षा सहर्ष, स्वप्न चौबीस के सजे|हर्षित जनमन‌ आज, नूतन संवत् विराजे||विनय करे ‘गोपाल’ , खुशी बाँटते सब रहे़ं।अंग्रेजी वर्ष की ,शुभेच्छा भी सभी कहें || २.मंगलमय  नववर्ष  हो, खुशमय हो परिवार।घर में मिल-जुल कर रहें,बाँटें सबको प्यार।।बाँटें सबको

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एक जनवरी पर कविता / शिवशंकर शास्त्री “निकम्मा”

नारी जीवन और संवेदना

एक जनवरी भारत का,कोई  भी नूतन साल नहीं।। चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष,नववर्ष है, किसको ख्याल नहीं? पेड़ों में पत्ते हैं पुराने,ठिठुर रहे हम जाड़े में।धुंध आसमां में छाए हैं,जलती आग ओसारे में।।तन में लपेटें फटे पुराने,कहीं न जाड़ा लग जाए,।धूप सूर्य की नहीं मिल रही,तरस रहें कि मिल जाए।। हमें जनवरी ना भाये, है हमसे

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यह पतन का पाशविक उत्थान /रेखराम साहू

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

     यह पतन का पाशविक उत्थान है शीर्ष से आहत हुआ सोपान है,भूमिका का घोर यह अपमान है। झुर्रियों का जाल है जो भाल पर,काल से संघर्ष का आख्यान है। पारितोषिक में अनाथालय उसे,उम्र भर जिसने किया बलिदान है। युद्ध का ज्वर,ज्वार है वर्चस्व का,यह पतन का पाशविक उत्थान है। बाढ़ आई थी यहाँ आतंक

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हमर का के नवा साल !/ राजकुमार ‘मसखरे’

हिंदी कविता

*हमर का के नवा साल !* हमर का के नवा साल….उही दिन-बादर,उही हालहमर का के नवा साल…. बैंक  म  करजा  ह  माढ़े  हेसाहूकार  दुवारी  म  ठाढ़े हेये रोज गारी,तगादा देवत हेदिनों दिन हमर खस्ता हालहमर का के नवा साल…..! नेता  मन  नीति  बनावत हेआनी- बानी के बतावत  हेसब  ल  बने  भरमा डारिनबस  उँखरे  गलत  हे 

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नया साल ख़ास / अकिल खान

समाज और यथार्थ

             नया साल ख़ास वक्त के साथ दिन-महीने,और बदल गए साल,निरंतर आगे बढ़ना है,यही है समय की चाल।मेहनत से हम सबको कुछ पाने की है,आश,यही है उम्मीद सभी का हो,नया साल ख़ास। नूतन वर्ष 2025 का,किजीए सभी इस्तकबाल,विनम्रता से बनाईए अपने जीवन को,खुशहाल।ऐब को त्याग कर,अच्छाई रखिए अपने पास,यही है उम्मीद सभी का हो,नया साल

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दरूहा सरकार पर कविता/ बिसेन कुमार यादव’बिसु’

हिंदी कविता

दरूहा सरकार। कोन किथे निपोर मन,इहा राम राज्य आवत हे।राम राज्य नई मोर भाई,दरुहा राज्य बनावत हे छत्तीसगढ़ के मनखे मन ला,अऊ दारू पिये बर सिखावत हे।सरकार हा खुदे जनता मन ला, मनपसंद दारू पियावत हे। सरकार हा मोबाइल फोन म ‘मनपसंद’ दारू एप खोले हे जी।ता दरूहा मन काहथे साय ला,हमला बने सरकार मिले

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गृहलक्ष्मी पर कविता/ डॉ नीतू दाधीच व्यास

हिंदी कविता

तुम आओगी क्या? मैं तुम्हें अपनी गृहलक्ष्मी बनाऊंगा,तुम आओगी क्या?बस तुम संग एक छोटा सा संसार बसाऊंगा,तुम आओगी क्या? नहीं लाऊंगा तोड़कर कोई चाँद – तारें,न ही जुगनू से रोशनी कराऊंगा।मैं तो तुम्हारे हाथों से ही, घर के मंदिर में दीप जलवाऊँगा।तुम आओगी क्या? नहीं करूंगा जन्म जन्म के साथ के वादे,ना ही कयामत में

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खूबसूरत है मग़र बेजान है / रेखराम साहू

हिंदी कविता

खूबसूरत है मग़र बेजान है खूबसूरत है मग़र बेजान है,ज़िंदगी से बुत रहा अनजान हैं। बेचता ताबीज़ है बहुरूपिया,है वही बाबा, वही शैतान है। माँगता है,शर्त रखता है कभी,‘प्यार का दावा’, अभी नादान है । रूह की कीमत बहुत नीचे गिरी,खूब मँहगा हो गया सामान है। है किशन का भक्त,इस पर शक उसे,कह रहा है,”

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शेष शव शिव पर कविता / रेखराम साहू

समाज और यथार्थ

शेष शव शिव पर कविता / रेखराम साहू शेष शव,शिव से जहाँ श्रद्धा गयी सभ्यता किस मोड़ पर तू आ गयी,कालिमा तुम पर भयंकर छा गयी। लालिमा नव भोर की है लीलकर,पूर्णिमा की चाँदनी, तू खा गयी। चाट दी चौपाल तुमने ऐ चपल !एकता का तीर्थ तू ठुकरा गयी। उड़ रही आकाश में अभिमान से

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कइसे के लगही जाड़ !/ राजकुमार ‘मसखरे

हिंदी कविता

कइसे के लगही जाड़ ! दुंग-दुंग ले उघरा बड़े बिहनियाझिल्ली,कागज़ बिनैया ल देख,कचरा म खोजत हे दाना-पानीतन  म लपटाय फरिया ल देख ! होत मूंदराहा ये नाली, सड़क मखरेरा,रापा के तैं धरइया ल देख,धुर्रा, चिखला म जेन सनाय हवैअइसन बुता के करइया ल देख ! मुड़ म उठाये बोझा,पेलत ठेलादुरिहा ले आये हे,दुवारी म देख,हाँका

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जुल्मी अगहन पर कविता / शकुन शेंडे
बचेली

प्रकृति और पर्यावरण

    जुल्मीअगहन जुलुम ढाये री सखी, अलबेला अगहन!शीत लहर की कर के सवारी, इतराये चौदहों भुवन!! धुंध की ओढ़नी ओढ़ के धरती, कुसुमन सेज सजाती।ओस बूंद नहा किरणें उषा की, दिवस मिलन सकुचाती।विश्मय सखी शरमाये रवि- वर, बहियां गहे न धरा दुल्हन!!जुलूम….. सूझे न मारग क्षितिज व्योम- पथ,लथपथ पड़े कुहासा।प्रकृति के लब कांपे-न बूझे,वाणी की

जुल्मी अगहन पर कविता / शकुन शेंडे
बचेली
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