हिंदी कविता

सच्चा प्रेम कभी संयोग नहीं होता

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

सच्चा प्रेम कभी संयोग नहीं होता संस्कारों में जकड़ामनप्रेम कोजान ही नहीं सकता। “मैं तुम्हेंहमेशा प्रेम करूँगा”—अक्सरइसका अर्थ होता है:जब तकतुम मुझेसुख देते रहो। जिसेहम प्रेम कहते हैं,वहअक्सरशर्तों कागठ्ठर होता है—औरवहउसी समय तकज़िंदा रहता हैजब तकपरिस्थितियाँअनुकूल रहती हैं। सुनकरचुभता है न? सदियों सेतारे गवाह रहे हैं—हाथों में हाथ,आँखों में सपने,आवाज़,शरीर,रंग,आकृति सेमोहितलोगों नेअनंतता कीकसम खाई। औरफिरइतना

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झूठे कर्तव्यों का बोझ

समाज और यथार्थ

झूठे कर्तव्यों का बोझ अगर कर्तव्यकंधों पर पत्थर बन जाए,तो समझ लो—वह कभी तुम्हारा था ही नहीं।सच्चा उत्तरदायित्वझुकाता नहीं,ऊँचा उठाता है। अधिकतर लोगजिसे “ज़िम्मेदारी” कहते हैं,वह दरअसलउधार लिया हुआ आदेश है।पूछो उनसे—तुम्हें कैसे पताकि यही तुम्हारा कर्तव्य है?उत्तर मेंबस एक खाली निगाह मिलेगी। “मुझे सफल होना ही चाहिए—यह मेरी ज़िम्मेदारी है।”“मुझे शानदार करियर बनाना है।”“मुझे

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The Stainless Mind

हिंदी कविता

The Stainless Mind प्रतिक्रिया नहीं—सचेत उत्तर चाहिए,जहाँ मन उछलता नहीं,ठहरकर देखता है। उकसावे से नहीं,स्पष्टता से जन्मे कर्म—तीव्र हों, सुंदर हों,पर मजबूरी से नहीं। जो तुरंत भड़कता है,वह अपना नहीं रहता,उसके कर्मदूसरों की चिंगारियों कीउधार ली हुई आग होते हैं। घाव, घाव को जवाब देता है—यही तो कैद है,न मौलिकता,न स्वतंत्रता। मन भी एक पात्र

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रेड लाइट एरिया

समाज और यथार्थ

रेड लाइट एरिया(अतुकांत कविता) यहाँ रातदिन से पहले जाग जाती है,और उजालेशर्म से सिर झुका लेते हैं। लाल बत्तियाँसिर्फ संकेत नहीं,यहाँ रुकी हुई ज़िंदगियों कीधड़कन हैं। हर दरवाज़े के पीछेकोई कहानी है—किसी की मजबूरी,किसी का छल,किसी का अधूरा बचपन। यहाँ हँसीसीखकर ओढ़ी जाती है,और आँसूमेकअप में छिपा दिए जाते हैं। कोई माँ हैजो रोज़ अपने

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उधार की रोशनी के पार

समाज और यथार्थ

उधार की रोशनी के पार(Beyond Borrowed Light)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता) सबसे गहरी जिज्ञासाकठोर प्रश्न से शुरू होती है—औरविनम्र मौन मेंसमाप्त होती है। हम जाँचते नहीं,मान लेते हैं।किसी पुराने धर्माचार्य ने कहा—तो सच होगा।किसी अमीर,किसी सत्ता-शिखर,किसी प्रसिद्ध चेहरे ने बोला—तो सही ही होगा। घर की परंपरा है,समाज की रीति है—इसलिएहम झुक जाते हैं। पर क्याहम

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लक्ष्मण रेखा के उस पार

समाज और यथार्थ

लक्ष्मण रेखा के उस पार(अतुकांत कविता) एक समय था—गलत कामअँधेरे में होते थे,पर अँधेरा हीशर्म का सबूत था। छिपनाइस बात की गवाही देता थाकि कहीं न कहींअभी नैतिकता ज़िंदा है,अभी आत्मापूरी तरह मरी नहीं है। तब समाजगलत को गलत कहने कासाहस तो रखता था,और अपराधीनज़र झुकाकर चलता था। अब—गलत कामखुले मंच पर हैं,तालियों के बीच,कैमरों

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(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)

समाज और यथार्थ

Slaves of Approval, Strangers to Truth(स्वीकृति के गुलाम, सत्य से अनजान)(दृष्टान्त सहित, लम्बी विचारप्रद अतुकांत कविता) सच यह है—तुम किसी और के गुलाम नहीं हो।तुमअपने डर के गुलाम हो,अपनी लालसा के गुलाम हो।और कोई मालिक नहीं। तुम्हारे जीवन केसबसे निजी कोने तकएक ही सवालदम घोंटता रहता है—“वे क्या सोचेंगे?” तुम बोलते होक्योंकि लोग देख रहे

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एक अग्नि से अगली अग्नि तक

हिंदी कविता

एक अग्नि से अगली अग्नि तक सूची पूरी करने वाले लक्ष्यदेह को चाहिए—टिक लग सके,इनाम मिले,नाम चमके। पर चेतनाकुछ और खोजती है—इतना विशाल,इतना उज्ज्वल,कि जीवन भर दौड़ोफिर भीपूरा न हो। इसलिएवही चुनोजिससे प्रेम करनाटालना असंभव हो।या ऐसा काम चुनोजो इतना बड़ा होकि प्रेमअपने आपजन्म ले। पूछो खुद से—क्या हैजो मैं बिना दाम के भी कर

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बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है

हिंदी कविता

“बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है” बलात्कारकोई अचानक घटितदुर्घटना नहीं,वहधीरे-धीरे पनपताहुआअंतिम विस्फोट है। यह तब शुरू होता हैजब दुनियाभोग की वस्तुबन जाती है। जब प्रगति का अर्थऔर ज़्यादा लेना,और ज़्यादा तोड़ना,और ज़्यादा जीतनाहो जाता है। छूने से पहलेकभी पूछा—इस स्पर्श मेंप्रेम है,यास्वार्थ? अगर स्पर्शसिर्फ़लेने के लिए है,तोशोषण दूर नहीं। रेखाबहुत पतली है। बलात्कारघर में

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पहले से ही घर

हिंदी कविता

पहले से ही घर कुछ लोगकिसी मंज़िल के लिएचलते हैं। और कुछमंज़िल से हीचलना शुरू करते हैं। दूसरेपहुँचें या न पहुँचें—वेपहले सेघर में होते हैं। जो मानते हैंकि दुनिया मेंकुछ हासिल करने लायकअंतिम चीज़ है,वेआशा मेंभटकते हैं। और कुछखिलाड़ी की तरहपूरी ताक़त से खेलते हैं—यह जानते हुएकि यहएक खेल है। वेडर से नहीं,असुरक्षा से नहीं—स्वतंत्रता

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स्वयं को पराजित करो

हिंदी कविता

स्वयं को पराजित करो सबसे बड़ा युद्धकिसी और से नहीं—अपने ही भीतर है। इच्छाएँ हैं,हितों पर खतरे हैं,जीवनलगातार चुनौती है—और हाँ,उसी में आनंद भी छिपा है। हम हारते हैंऔर चकित रह जाते हैं—मैं क्यों नहीं जीत पा रहा?क्यों हर बारखुद से हीपीछे रह जाता हूँ? ध्यान से देखो—हार बाहर से नहीं आती।वह भीतर जन्म लेती

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तीसरी स्त्री

हिंदी कविता

“तीसरी स्त्री” पहली स्त्री—जिसेजीवविज्ञान के नाम परसंस्कारों ने गढ़ा।सिखाया गया—मुस्कराओ,सह लो,सज कर रहो।तुम्हारी कीमततुम्हारे शरीर में है। दूसरी स्त्री—विद्रोही।क्रोधित,तैयार।उसने कहा—मैं भी वही करूँगीजो तुम करते हो।वही कपड़े,वही भाषा,वही दौड़। पर शांति?वह भी नहीं मिली। दासता बदली,पर ढाँचा वही रहा।प्रतिक्रियादोहराव बन गई। और अबतीसरी स्त्री कीसंभावना है। न परंपरा की कैदी,न विद्रोह की नकल। वहन शरीर

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