काश मेरा भी भाई होता !! रक्षाबंधन पर कविता
मन और भावनाएँरक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ ।। रक्षाबंधन पर बहन के तरफ से भाई के लिए प्रेम भावना प्रकट किया है ।।
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रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ ।। रक्षाबंधन पर बहन के तरफ से भाई के लिए प्रेम भावना प्रकट किया है ।।
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आओ खेल खेलें आओ जीवन के सतरंगी खेल खेले, अपनी कला को प्रदर्शित करें । चलो खुद मे एक विश्वास लाए, आओ हम एक खेल खेले । है नहीं हारने की चाहत ,ओैर नहीं है जीतने की उम्मीद ।बस खेल में डूब जाने का मन,आओ खेल खेले एक ऐसा । अस्तव्यस्त है बिन खेल जिंदगी
आओ खेल खेलें-रिंकीकाशी नरेश यादव Read More »
आओ मेरे श्याम -बिसेन कुमार यादव ‘बिसु’ जन्माष्टमी महोत्सव पर कविता गोपियों के संग रास रचैया तुम हो मेरे किशन कन्हैया।तेरे आराधक तुम्हें बुला रही है,चले आओ मेरे साॅंवरिया।। मीरा के प्रभु गिरधर नागर।राधा के तुम हो मुरलीधर।। मेरे लिए तो तुम श्रीराम हो।और तुम ही मेरे घनश्याम हो।। इस प्यासी नयन की प्यास बुझाने
आओ मेरे श्याम -बिसेन कुमार यादव ‘बिसु’ Read More »
बैरिस्टर छेदीलाल ठाकुर की जयंती गणेश चतुर्थी पर विशेष
छत्तीसगढ़ के बघवा बैरिस्टर छेदीलाल ठाकुर Read More »
खेल खेलना हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है । खेल खेलने से हमारा स्वस्थ भी ठीक रहता है और शरीर में भी फूर्ती रहती है ।
आओ खेलें खेल जीवन के इस दौड़ में,चल थोड़ा शामिल हो जाएं।उत्साह और उमंग से,चल ऐसा अभ्यास करें।स्फूर्ति और चपलता से,नित जीत का नया स्वाद चखें।तोड़ डालें पूर्वानुमानों को,इतना हम सब आगे बढ़ें।उठो, जागो और मत रुको,जब तक की लक्ष्य ना पा जाओ।आदर्श वाक्य जो अपनाया विश्व ने,और तेज, और ऊंचा और ताकतवर का,सदा चलो
आओ खेलें खेल -संजय कुमार गुप्ता Read More »
सदा छला जन का विश्वास विश्वास गीत (१६,१५) सत्ताधीशों की आतिश से,जलता निर्धन का आवास।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। युग बीते बहु सदियाँ बीती,चलता रहा समय का चक्र।तहखानों में धन भर जाता,ग्रह होते निर्बल हित वक्र।दबे भूलते मिले दफीने,फलती मचली मिटती आस।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। सत्ता
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29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस. ————— आओ खेल खेलें—————– खेल है मानव जीवन का अभिन्न अंग,खेल से छाई जीवन में खुशहाली का रंग।खेल है अनमोल उपहार यह सब को बोलें,जीवन के उद्धार के लिए, आओ खेल खेलें। कोई खेले हॉकी क्रिकेट तो कोई कबड्डी,शरीर हो जाए स्वस्थ और मजबूत- हड्डी।आलसी – जीवन और खेल दोनों
आओ खेल खेलें- 29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस Read More »
माँ के आँचल में सो जाऊँ (१६ मात्रिक) आज नहीं है, मन पढ़ने का,मानस नहीं गीत,लिखने का।मन विद्रोही, निर्मम दुनिया,मन की पीड़ा, किसे बताऊँ,माँ के आँचल में, सो जाऊँ। मन में यूँ तूफान मचलते,घट मे सागर भरे छलकते।मन के छाले घाव बने अब,उन घावों को ही सहलाऊँ,माँ के आँचल में सो जाऊँ। तन छीजे,मन उकता
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दोषी पर कविता ( १६,१४ ताटंक छंद ) सामाजिक ताने बाने में,पिसती सदा बेटियाँ क्यों?हे परमेश्वर कारण क्या है,लुटती सदा बेटियाँ क्यों? मात पिता पद पूज्य बने हैं,सुत को सीख सिखाते क्या?जिनके सुत मर्यादा भूले,पथ कर्तव्य बताते क्या? दोष तनय का, यह तो तय है,मात – पिता सच, दोषी है।बेटों को सिर नाक चढ़ाया,यही महा