हिंदी कविता

बेटी कली है फूल है बहार है

हिंदी कविता

बेटी कली है फूल है बहार है बेटी, बेटी कली है, फूल है, बहार है,बेटी, बेटी गीत है, संगीत है, सुरों की तार है,बेटी, बेटी धन है, ताकत है, साहस का भंडार है,बेटी, बेटी घर की जन्नत, स्वर्ग का द्वार है। बेटी, बेटी पिता की लाडली, माँ की ममता अपार है,बेटी, बेटी प्यारी – प्यारी […]

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तुम लेखक नहीं नर पिचास हो

हिंदी कविता

तुम लेखक नहीं नर पिचास हो सिर्फ तुम ही नहींतुम से पूर्व भी थीपूरी जमात भांडों की।जो करते रहे ताथाथैयादरबारों की धुन पर।चाटते रहे पत्तलसियासी दस्तरखान पर।हिलाते रहे दुमसियासी इशारों पर।चंद रियायतों के लिएचंद सम्मान-पत्रों के लिए।करते रहे कत्लजनभावनाओं का।करते रहे अनसुनाकरुण चीखों को।करते रहे नजर अंदाजअंतिम पायदान केव्यक्ति की पीड़ा।तुम लेखक नहींनर पिचास हो।

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Happy Republic day

भारत गर्वित आज पर्व गणतंत्र हमारा

प्रकृति और पर्यावरण

भारत गर्वित आज पर्व गणतंत्र हमारा धरा हरित नभ श्वेत, सूर्य केसरिया बाना।सज्जित शुभ परिवेश,लगे है सुभग सुहाना।।धरे तिरंगा वेश, प्रकृति सुख स्वर्ग लजाती।पावन भारत देश, सुखद संस्कृति जन भाती।। भारत गर्वित आज,पर्व गणतंत्र हमारा।फहरा ध्वज आकाश,तिरंगा सबसे प्यारा।।केसरिया है उच्च,त्याग की याद दिलाता।आजादी का मूल्य,सदा सबको समझाता।। सिर केसरिया पाग,वीर की शोभा होती।सब कुछ

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गणतंत्र गाथा / बाबू लाल शर्मा ” बौहरा ”

हिंदी कविता

गणतंत्र गाथा / बाबू लाल शर्मा ” बौहरा ” पुरा कहानी,याद सभी को, मेरे देश जहाँन की।कहें सुने गणतंत्र सु गाथा, अपने देश महान की। सन सत्तावन की गाथाएँ,आजादी हित वीर नमन।रानी झाँसी नाना साहब, ताँत्या से रणधीर नमन। तब से आजादी तक देखो,युद्व रहा ये जारी था।वीर हमारे नित मरते थे, दर्द गुलामी भारी

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हिन्द देश के वीर/बलबीर सिंह वर्मा “वागीश”

हिंदी कविता

हिन्द देश के वीर/बलबीर सिंह वर्मा “वागीश” आजादी का पर्व ये, हर्षित सारा देश।छाई खुशियाँ हर तरफ, खिला-खिला परिवेश।।खिला – खिला परिवेश, गीत हर्षित हो गाए।मना रहे गणतंत्र, तिरंगा नभ लहराए।।थे सब वीर महान, जिन्होंने जान लगा दी।आया दिन ये खास, मिली हमको आजादी।। भारतवासी एक सब, एक हमारा धर्म।जाति-पाति सब भूलकर, देशभक्ति है कर्म।।देशभक्ति

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आओ मिलकर गणतंत्र सफल बनाएँ /डॉ.अमित कुमार दवे

समाज और यथार्थ

आओ मिलकर गणतंत्र सफल बनाएँ /डॉ.अमित कुमार दवे आओ जन-गण-मन को ऊपर उठाएँ,नित नवीन विचारों की शृंखला बनाएँ।हर चेहरे को फिर… वैसा ही महकाएँ,आओ मिलकर गणतंत्र सफल बनाएँ।।1।। त्याग-संयम-सहयोग सदा हो सहचरऐसी संस्कारित आदर्श पीढ़ी बनाएँ।सदा सामर्थ्य जो निज कांधों में बसाएँआओ! मिलकर गणराज भारत बनाएँ।।2।। प्राचीन राष्ट्रगौरव फिर अर्वाचीन करवाएँ,जीवन्त संस्कृति अब जग में

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आजा अब परदेशिया

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आजा अब परदेशिया आजा अब परदेशिया , तरस रहे हैं नैन ।बाट जोहती हूँ खड़ी , पल भर खोजूँ चैन ।।पल भर खोजूँ चैन , लगे जग सारा सूना ।सावन भादो मास , अश्रु अब बढ़ते दूना ।।कह ननकी कवि तुच्छ , झलक अपना दिखला जा ।मिलन करो मनमीत , शीघ्रता से घर आजा ।।

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चित्र मित्र इत्र चरित्र

हिंदी कविता

चित्र मित्र इत्र चरित्र चित्र रचित कपि देखकर, डरती जो सुकुमारि।नव चरित्र वनवास में, रहती जनक दुलारि।। मित्र मिले यदि कर्ण सा, सखा कृष्ण सा साथ।विजित सकल संसार भव, वह चरित्र दे नाथ।। गन्धी चतुर सुजान नर, बेच रहे नित इत्र।सूँघ परख कर ले रहे, ग्राहक बुद्धि चरित्र।। मित्र इत्र सम मानिये, यश सुगंध प्रतिमान।भव

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विवाह-एक पवित्र बंधन

नारी जीवन और संवेदना

विवाह-एक पवित्र बंधन विवाह एक संस्कृति व संस्कार है।विवाह बंधनों का मधुर व्यवहार है।दो पवित्र आत्माओं का होता मिलन।लुटाएँ एक दूजे पर असीम प्यार है।1।सात जन्मों का है ये प्यारा बंधन।वंश बेला बढ़ाने का नाम है जीवन।केवल बंधन नहीं विवाह स्त्री पुरुष का।दो पवित्र आत्माओं का है मधुर मिलन।2।सुख दुख बाँटने का रास्ता है विवाह।जीवन

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घर का संस्कार है बेटी

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घर का संस्कार है बेटी घर आँगन की शान,अभिमान है होती।माँ बाप की जान पहचान होती है बेटी।अक्सर शादी के बाद पराए हो जाते हैं बेटे।दो कुलों की मान-सम्मान होती है बेटी।1।माँ के रूप में ममता की मूरत है बेटी।पत्नी के रूप में फर्ज की सूरत है बेटी।पीहर व ससुराल के बीच सामंजस्य बिठाये।दया,त्याग,प्रेम की

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मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ / गोपालदास “नीरज”

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मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ / गोपालदास “नीरज” मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर कीहो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ? मीलों जहाँ न पता खुशी कामैं उस आँगन का इकलौता,तुम उस घर की कली जहाँ नितहोंठ करें गीतों का न्योता,मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम

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हार न अपनी मानूँगा मैं ! / गोपालदास “नीरज”

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हार न अपनी मानूँगा मैं ! / गोपालदास “नीरज” हार न अपनी मानूँगा मैं ! चाहे पथ में शूल बिछाओचाहे ज्वालामुखी बसाओ,किन्तु मुझे जब जाना ही है —तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं ! मन में मरू-सी प्यास जगाओ,रस की बूँद नहीं बरसाओ,किन्तु मुझे जब जीना ही है —मसल-मसल कर उर के

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