कोरोना पर हास्य लेख
हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविताकोरोना-वायरस
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समय पर कविता समय के पाससमय नहीं हैकि थोड़ी देर रुकेतुम्हारे लिए अच्छा होगाकि तुम भी न रूकोचलते रहोसमय के साथ रुकने वालों काकोई संवाद नहीं होताकोई कहानी नहीं होतीकोई इतिहास नहीं होता चलते रहने वालोंतुम चलते ही रहोतुम्हारे बारे मेंएक दिनसमय सबको बताएगा — नरेन्द्र कुमार कुलमित्र9755852479
स्त्री पर कविता जीवन भरचुपचापसहती हैउलाहनों के पत्थरऔरदेती हैआशीषों की छाँह बड़ी आसानी सेकाटो तो कट जाती हैजलाओ तो जल जाती हैआपके हितों के लिएईंधन की तरह पेड़ होती है स्त्री। — नरेन्द्र कुमार कुलमित्र9755852479
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कोरोना पर कविता वुहान चीन से फैल कोरोना ,दुनियाभर में हाहाकार मचाया ।छोटे बड़े सभी देशों में,खलबली मचाया ।। इटली अमेरिका जैसे,देश भी बच नहीं पाये ।विश्व के कोई देश,अपने को बचा नहीं पाये।। घर में रहकर,लॉकडाउन का पालन करना होगा।परिवार को सुरक्षित रख,देश को बचाना होगा ।। कोरोना से बचने,मास्क,सेनेटाइजर लगाना होगा ।अपना कर्तव्य
यहाँ माँ पर हिंदी कविता लिखी गयी है .माँ वह है जो हमें जन्म देने के साथ ही हमारा लालन-पालन भी करती हैं। माँ के इस रिश्तें को दुनियां में सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता है। माँ की वह आँख पर कविता जब मैंने सुना कि माँ की एक आँख की रोशनी चली गई हैसहसा
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प्रधानमंत्री पर कविता प्यारे बच्चों ! सुप्रभातकल प्रधानमंत्री जीआप लोगों के साथ सीधे वार्तालाप करेंगेआप अनुशासित रहेंगेमतलब इधर-उधर नहीं देखेंगेअपने से कुछ भी नहीं बोलेंगेप्रधानमंत्री जी की बातों पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देंगेचुपचाप प्रधानमंत्री जी की बातों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे हम आपको कुछ प्रश्न देंगे(जो प्रश्न हमें दिया जाएगा)वे प्रश्न चुनिंदा बच्चों को दिए
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मेरी और पत्नी पर कविता – 30.04.2022 मेरी पत्नी दोपहर बादअक़्सर कुछ खाने के लिएमुझे पूछती हैमैं सिर हिलाकरसाफ मना कर देता हूँमेरे मना करने सेउसे बहुत बुरा लगता हैकि मैंने उसकी मेहनत और प्यार सेबनाई चीजों का तिरस्कार किया है पर उसे पता नहीं होताकि मेरे खाने की इच्छा होने पर भीमैं जब-जब उसकी
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क्रोध पर कविता मुझे नहीं पतापहली बारमेरे भीतरकब जागा था क्रोधशुरूआत चिनगारी-सी हुई होगीआज आग रूप मेंसाकार हो चुकी हैफिर भी इतनी भीषण नहीं हैकि अपनी आंच से किसी को बुरी तरह झुलसा देअपनी तीव्र लपट से जला दे किसी का घरया राख कर दे किसी की फसलों से भरी खेतहाँ कभी-कभीअपनी क्रोध की ऊष्मा
यह ज़िन्दगी पर कविता रंगीन टेलीविजन-सी यह ज़िन्दगीलाइट गुल होने परबंद हो जाती है अचानककाले पड़ जाते हैं इसके पर्देबस यूँ ही–अचानक थम जाती हैहमारी उम्रऔर थम जाते हैंजीवन और मृत्यु के अहसासऔर सारे रहस्य। — कुलमित्र9755852479
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बताइये आप कौन हैं कुछ लोग हामी भरने मेंबड़े माहिर होते हैंपर काम कुछ भी नहीं करतेउनके मुख से हमेशानिकलता है हाँ-हाँ-हाँइनके शब्दकोश में ‘ना’ शब्द नहीं होताये कभी ना कहते ही नहींज़बान से कभी मुकरते ही नहींकाम करो या न करोइनके लिए हाँ कहना ही स्वामीभक्ति होती है कुछ लोग हाँ कहने के बादकाम
कैमरे पर कविता वे रहते हैं ब्लैकआउट कमरों मेंवे हमें देखकर चलते है दांवबंद होते हैं उनके दरवाज़े और किवाड़हर बार हमारे साथ होता है खिलवाड़ हम देख नहीं पातेकोई भी उनकी कारगुजारियांकोई भी चालाकियां…. अब गए वो ज़मानेजब दीवारों के भी कान होते थे। — नरेन्द्र कुमार कुलमित्र9755852479