कुण्डलिया
हिंदी कविताकुण्डलिया अंदर की यह शून्यता , बढ़ जाये अवसाद ।संशय विष से ग्रस्त मन , ढूढ़े ज्ञान प्रसाद ।।ढूढ़े ज्ञान प्रसाद , व्यथित मन व्याकुल होता ।आत्म – बोध से दूर , … खड़ा एकाकी रोता ।।कह ननकी कवि तुच्छ , सतत शुचिता अभ्यंतर ।कृपा करें जब संत , बोध होता उर अंदर ।। ~ […]


