हिंदी कविता

क्या होती है निराशा – धनेश्वर पटेल

हिंदी कविता

क्या होती है निराशा लेती जो छीन जीने की आशापेंचीदा है ,इसकी परिभाषासवालों से घिरे बयां करते चेहरे,बता रहे क्या होती है निराशा।।     खो गई मुस्कान कहीं दूर    किस्मत में नहीं, वो भी मंजूर    आंखो में छाई, काली घटा    आंसू भी बरसने को मजबूर।। टूटे सपनों को फिर जोड़ना चाहूंजो

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हाँ ये मेरा आँचल-वर्षा जैन “प्रखर

हिंदी कविता

हाँ ये मेरा आँचल आँचल, हाँ ये मेरा आँचलजब ये घूंघट बन जाता सिर परआदर और सम्मान बड़ों काघर की मर्यादा बन जाता है जब साजन खींचें आँचल मेराप्यार, मनुहार और रिश्तों मेंयही सरलता लाता हैप्यार से जब शर्माती हूँ मैंये मेरा गहना बन जाता है मेरा बच्चा जब लड़ियायेआँचल से मेरे उलझा जाएममता का

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बेटी हूँ आपकी-भागवत प्रसाद साहू

प्रकृति और पर्यावरण

बेटी हूँ आपकी कोख मे पल रही , शीघ्र जग में आऊ। नन्ही सी परी बन,जन जन को बतलाऊ। हूं बेटी मैं आपकी,दूध का कर्ज चुकाऊ।एक नही दो-दो कुल की,लाज बचाऊ।बेटी हूं आपकी……………….। पंख नही फिर भी,आसमान उड़ जाऊ। मंगल पर रख कदम,दुनिया को हसाऊ।। बेटा नही बेटी हु इस धरा की,आवाज दे चिल्लाऊ।तू कहे

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गाय गरुवा के हड़ताल

नारी जीवन और संवेदना

गाय गरुवा के हड़ताल हमरो बनय राशन कारड चारा मिलय सरकारी ।सब्बो योजना ल छोड़ भर पेट मिलय थारी।जब तक पूरा न होवय गरुवा घुरुवा अउ बारी ।गाय गरुवा के हड़ताल रही जारी…….। छत्तीसगढ़ के चारो कोती हामर हावय चिन्हारी ।चाहे नेता चाहे बाबा चाहे ओ रास बिहारी।लोटा लोटा गोरस पियय चारा के नइये पुछारी

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भारत माता रोती है -हृषिकेश प्रधान “ऋषि”

हिंदी कविता

         भारत माता रोती है जब-जब सीमा पर अपना,वीर सपूत खोती है ।तब भारत माता रोती है,तब भारत माता रोती है ।। सीने से लगाकर मां जिसको दूध पिलाती ।गोद में बिठाकर मां जिसको रोटी खिलाती ।छाती में लिटाकर  मां जिसको लोरी सुनाती। बाहों में झूलाकर  मां जिसको रोज सुलाती ।जब कोई मांअपने लाल का,पुण्यतिथि मनाती

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स्वरोजगार तुमको ढूंढना हैं/डीजेन्द्र कुर्रे “कोहिनूर”

समाज और यथार्थ

“डीजेन्द्र कुर्रे की कविता ‘स्वरोजगार तुमको ढूंढना है’ में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा दी गई है। यह कविता युवाओं को स्वरोजगार के महत्व को समझाते हुए उन्हें प्रेरित करती है कि वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए खुद को ढूंढें और अपने पैरों पर खड़े हों।” सारांश: “स्वरोजगार तुमको ढूंढना है” एक

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पिता होने की जिम्मेदारी – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

पिता होने की जिम्मेदारी दो बच्चों का पिता हूँ मेरे बच्चे अक्सर रात मेंओढ़ाए हुए चादर फेंक देते हैओढ़ाता हूँ फिर-फिरवे फिर-फिर फेंकते जाते हैं उन्हें ओढ़ाए बिना… मानता ही नहीं मेरा मन वे होते है गहरी नींद मेंउनके लिए अक्सर टूट जाती हैंमेरी नींदें… एक दिन  गया था गाँव रात के शायद एक या दो

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पितृ पक्ष का सच्चा श्राद्ध-धनंजय सिते(राही)

हिंदी कविता

पितृ पक्ष का सच्चा श्राद्ध ‘ आजका बच्चा कलका यूवाऔर परसो बुढ़ा होना है!ये प्रकृती का नियम है सबकोएक दिन इससे गुजरना है!!                  २आजकी बेटी कल पत्नी मातापरसो वह भी बनेगी सास!बेटा आजका कल पती,पिता हैदादा,नाना परसो का खास!!                 

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इंतज़ार आँखे में

हिंदी कविता

इंतज़ार आँखे में इंतज़ार करती है आँखेहर उस शक्श की, जिसकी जेब भरी हो,किस्मत मरी हो, लूट सके जिसे,छल सके जिसे, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर उस बीमार की, जो जूझ रहा है मर्ज में,औंधे पड़ा है फर्श में, कर सके जिससे अपनी जेब गर्म,लूट सके इलाज के बहाने, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर

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सांध्य है निश्चल -बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’

नारी जीवन और संवेदना

सांध्य है निश्चल रवि को छिपता देख, शाम ने ली अँगड़ाई।रक्ताम्बर को धार, गगन में सजधज आई।।नृत्य करे उन्मुक्त, तपन को देत विदाई।गा कर स्वागत गीत, करे रजनी अगुवाई।। सांध्य-जलद हो लाल, नृत्य की ताल मिलाए।उमड़-घुमड़ कर मेघ, छटा में चाँद खिलाए।।पक्षी दे संगीत, मधुर गीतों को गा कर।मोहक भरे उड़ान, पंख पूरे फैला कर।।

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सेवा का संरक्षण- दिलीप कुमार पाठक “सरस”

हिंदी कविता

है झुकी डाल फल फूल फली,मुस्कानें लख-लख लहरातीं | था एक बीज जो वृक्ष बना, बरसातें उसको नहलातीं|| माटी पाकर आया बचपन,सेवा का संरक्षण पाया| लकड़ी पत्ती फल फूल कली, है सेवा की सिर पर छाया|| गुरु मातु पिता का संरक्षण, हम सबने ही कल पाया था| जिनके अपने श्रम के बल पर, कल अंकुर बन मुस्काया था|| कुछ

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निषादराज के दोहे

हिंदी कविता

*निषादराज के दोहे (1) संसारकितना प्यारा देख लो,ये अपना संसार।स्वर्ग बराबर हैं लगे,गाँव-शहर वनद्वार।। (2) समयसमय बड़ा अनमोल है,कीमत समझो यार।समय बीत जब जायगा,फँसो नहीं मझधार।। (3) गतिअपनी गति में काम को,करना अच्छा यार।तभी सफलता हैं मिले,उन्नति  घर संसार।। (4) जीवनजीवन की इस राह पर,चलना कदम सम्हाल।आगे   पीछे   देखना, रहे  न  कोई   काल।। (5) मनमन

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