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हिन्दू नववर्ष ( चैत्र नवरात्र ) पर कविता
बेटी पर दोहे -सुकमोती चौहान
शानदार पार्टी
सद्गुरु-महिमा न्यारी जग का भेद खोल दे
रोज ही देखता हूँ सूरज को ढलते हुए
बसन्त और पलाश
तुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं
माँ कुष्माण्डा पर कविता
कटुक वचन है ज़हर सम
चुनाव का बोलबाला
कालचक्र गतिशील निरन्तर होता नहीं विराम
सरस्वती दाई तोर पइयां लागव ओ
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