हिंदी कविता

हिन्दू नववर्ष ( चैत्र नवरात्र ) पर कविता

समाज और यथार्थ

चैत्र हिंदू पंचांग का पहला मास है। इसी महीने से भारतीय नववर्ष आरम्भ होता है। हिंदू वर्ष का पहला मास होने के कारण चैत्र की बहुत ही अधिक महता है। अनेक पर्व इस मास में मनाये जाते हैं। चैत्र मास की पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र में होती है इसी कारण इसका महीने का नाम चैत्र पड़ा। […]

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बेटी पर दोहे -सुकमोती चौहान

समाज और यथार्थ

बेटी पर दोहे -सुकमोती चौहान १.बेटी होती लाड़ली,जैसे पुष्पित बाग।बिन बेटी के घर लगे, रंग चंग बिन फाग।। २.बेटी लक्ष्मी गेह की,अब तो नर लो मान।सेवा कर माँ बाप की,बनती कुल की शान।। ३.साक्षर होगी बेटियाँ,उन्नत होगा देशभर संस्कार समाज में,बदलेंगी परिवेश।। ४.बहु भी बेटी होत है,रखो न दूजा भावनिज बेटी सा मान दो,लाओ जी

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शानदार पार्टी

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शानदार पार्टी चल रही थी खूब,अमीर दिलदार लोगों की पार्टी ,जहां शामिल होने के लिए ,किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं ,और ना ही आवश्यकता है,निश्चित राशि की।बस एक मुस्कान के साथ कह दो ,मुझे भी शामिल करोगे यार।मां ने बस दस रुपए दिए हैं ,एक साथ आवाज आई ,“आ जाओ!”पैसे की भी जरूरत नहीं ,पूरी

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सद्गुरु-महिमा न्यारी जग का भेद खोल दे

हिंदी कविता

सद्गुरु-महिमा न्यारी सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।पाये जो गुरु से दीक्षा, उसके भाग्य जागते।।गुरु-चरण को धोके, करो रोज उपासना।ध्यान में उनके खोकेेे, त्यागो समस्त वासना।।गुरु-द्रोही नहीं होना, गुरु आज्ञा न टालना।गुरु-विश्वास का खोना, जग-सन्ताप पालना।।गुरु की गरिमा भारी,

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रोज ही देखता हूँ सूरज को ढलते हुए

हिंदी कविता

रोज ही देखता हूँ सूरज को ढलते हुए दरख्त रोज ही देखता हूँसूरज को ढलते हुए!फिर अगली सुबह ,निकल आता है मुस्कुराकर!नयी उम्मीद और विश्वास लिए,मेरे पास अब उम्मीद भी नहीं बचीमेरे सारे पत्तों की तरह!सपने टूटने लगते हैंजब देखता हूँकुल्हाड़ी लिये,बढ़ रहा है कोई मेरी ओर..मैं लाचार…विवश…उसे रोक नहीं सकताक्योंकि–उस इंसान की तरह ही

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बसन्त और पलाश

प्रकृति और पर्यावरण

बसन्त और पलाश दहके झूम पलाश सब, रतनारे हों आज।मानो खेलन फाग को, आया है ऋतुराज।आया है ऋतुराज, चाव में मोद मनाता।संग खेलने फाग, वधू सी प्रकृति सजाता।लता वृक्ष सब आज, नये पल्लव पा महके।लख बसन्त का साज, हृदय रसिकों के दहके।।शाखा सब कचनार की, लगती कंटक जाल।फागुन की मनुहार में, हुई फूल के लाल।हुई

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तुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं

हिंदी कविता

तुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं नैनों की झील में इश्क़ का पतवार लियेकौन कहता है कि कभी उतरा नहीं हूँ मैं ?बिखरा तो बहुत हूँ ज़िंदगी के जद्दोजहद मेंतुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं ?तब मेरे बालों पे उंगलियाँ क्या फेर दीं तुमनेउस आइने से पूछिए कब से संवरा नहीं

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माँ कुष्माण्डा पर कविता

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माँ कुष्माण्डा पर कविता सूर्य मंडल में बसी,अलौकिक कांति भरी,शक्ति पूँज माँ कुष्माण्डा,तम हर लीजिए।अण्ड रूप में ब्रम्हाण्ड,सृजन कर अखण्ड,जग जननी कुष्माण्डा,प्राण दान दीजिए।दुष्ट खल संहारिनी,अमृत घट स्वामिनी,आरोग्य प्रदान कर, रुग्ण दूर कीजिए।शंख चक्र पद्म गदा,स्नेह बरसाती सदा,सृष्टि दात्री माता रानी,ईच्छा पूर्ण कीजिए ✍ सुकमोती चौहान “रुचि”बिछिया,महासमुन्द,छ.ग.कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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कटुक वचन है ज़हर सम

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कटुक वचन है ज़हर सम वाणी ही है खींचती भला बुरा छवि चित्रवाणी से बैरी बने वाणी से ही मित्रसंयम राखिए वाणी पर वाणी है अनमोलनिकसत है इक बार तो विष रस देती घोल। कटुक वचन है ज़हर सम मीठे हैं अनमोलवाणी ही पहचान कराती तोल मोल कर बोलकटु वाणी हृदय चुभे जैसे तीर कटार

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चुनाव का बोलबाला

नारी जीवन और संवेदना

चुनाव का बोलबाला हर  गली   में   बोलबाला  है।अब  वक्त  बदलने  वाला  है।।जो चुनाव नजदीक आ गया,बहता   दारू  का   नाला  है।।उन्हें  वोट  चाहिए  हर  घर  से,हर  महिला  इनकी  खाला  है।।साम, दाम, दण्ड, भेद अपनाए,सच  की  छाती  पर  छाला  है।।झुग्गी  में   नेता   रोटी   खाए,समझ  लो गड़बड़  झाला  है।।कल  चाहे  ये  बलात्कार   करें,आज  बहन  हर  एक  बाला है।।ये 

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कालचक्र गतिशील निरन्तर होता नहीं विराम

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कालचक्र गतिशील निरन्तर होता नहीं विराम कालचक्र गतिशील निरन्तर                      होता नहीं विराम,दुख    के   पर्वत,नदिया,नाले               सुख का अल्प विराम।अब तक मुझको समझ न आया                   इस जगती का रागरास       न आयी   इसकी  माया                 कैसे    हो   अनुराग !शिथिल हुआ है तन ये जर्जर               मन भागे   अविरामदुख के पर्वत , नदिया , नाले ,             सुख का अल्प विराम।छायी है

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सरस्वती दाई तोर पइयां लागव ओ

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सरस्वती दाई तोर पइयां लागव ओ ~~~~सरस्वती दाई तोर पइयां लागव ओ।कंठ में बिराजे जेकर भाग जागय ओ।तोरे आसरा म नान्हे लइका पढ़ जाथे।बुद्धि पाके ज्ञानी कलाकार बन जाथे।मन ल भरमा के तंय,धार ल ठहरा के तंय।डहके डुबत नइयां लागय ओ।सरसती दाई ………बिनती हावय दाई सब ल ज्ञान म नौहादे।दुखिया ल सुख दे तंय पीरा

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