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होली के दोहे – बासुदेव अग्रवाल
ऋतु बसंत आ गया
दिल की बात बताकर देखो
मंज़िल पर कविता
उपवन की कचनार कली है
माँ पर कविता
फागुन में पलाश है रंगों भरी दवात
फागुन आ गया
बासंती फागुन
हसरतों को गले से लगाते रहे
कैसे जुगनू पकड़ूं?
किस मंजिल की ओर ?
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