दोहा पंचक
हिंदी कवितादोहा पंचक -रामनाथ साहू ननकी किन्नर खूब मचा रहे , रेलयान में लूट ।कैसी है ये मान्यता , दी है किसने छूट ।। जल थल नीले गगन पर ,, मानव का आतंक ।दोहन जो करता मिले , सागर को ही पंक ।। हिंसा हुई बढ़ोतरी , होत अहिंसा छोट ।सबके मन को भा गई ,

