समाज और यथार्थ

गंगा की पुकार

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गंगा की पुकार गंगा घलो रोवत हे,देख पापी अत्याचार।रिस्तेदारी नइये ठिकाना,बढ़गे ब्यभीचार।। कलयुग ऊपर दोष मढत हे,खुद करम में नहीं ठिकाना।कइसे करही का करही एमनओ नरक बर करही रवाना।। स्वार्थ के डगर अब भारी होगेअनर्थ होत हे प्यार।प्यार अंदर अब नफरत हवयबढे हवय अत्याचार।। प्यार नाम अब धोखा हवे सुन लौ जी संत समाज।हृदय काकरो

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शिक्षक का आशीर्वाद

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शिक्षक का आशीर्वाद अमूर्त को मूर्त रूप देकर,जग को दिखलाया है,शिक्षक,समाज में ज्ञान का महत्व को बताया है।शिक्षक,शिक्षा से अज्ञानी को ज्ञानी है बनायाशिक्षक,संसार मे सभी लोगों को है अपनाया।बेशक,गुरू – कृपा से शिष्य हुए हैं आबाद,जीवन में अनमोल है,शिक्षक का आशीर्वाद। असहायों का ज्ञान से रोशन होता है जमीर,ज्ञान अर्जित सभी करते हैं,गरीब हो

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दृश्य के उस पार / रमेश कुमार सोनी

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दृश्य के उस पार / रमेश कुमार सोनी उस एक दृश्य में उसकीआँख में मैंने गंभीर ख़ौफ़ देखाजिसे उन्होंने ही पाल-पोष कर बड़ा किया थाखून से इतनी मोहब्बत कीहुजूम चलती है उनके साथ लार टपकातेअहंकार से चूर इन्हें किसी से कोई मतलब नहीं। दूसरे दृश्य में करुणा है, लाचारी है किउसका कोई और मालिक हैमाली

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शाकाहार सर्वोत्तम आहार / गीता सागर

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शाकाहार सर्वोत्तम आहार–दोहा भोजन शाकाहार को, खाते हैं जो लोग। जीते लंबी उम्र तक, पाते बदन निरोग ।। शाकाहारी जो बने, रहे सदा संतोष। स्वच्छ रहे तन मन सदा, शीघ्र न आये रोष।। शाकाहारी अन्न के , मिलते लाभ अनेक ।जीवन होता सादगी, हो विस्तार विवेक।। सादा भोजन उच्च है, कहते संत सुजान। महापाप है

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बेचकर देखों मुझे जरा

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बेचकर देखों मुझे जरा पूछने से पहले जवाब बना लिये।यार  सवाल तो गजब़ बना लिये। किसी ने पूछा ही नहीं मैं जिंदा हूँ,मगर तुम हसीन ख्वाब बना लिये। और और,और कहते रहे गम को,लो आशुओं का हिसाब बना लिये। मेरी मिलकियत न रहीं वजूद मेरा,समाज से कहों कसाब बना लिये। सौ-सौ सवाल गोजे पे रसीद

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बसंत  की  बहार में

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बसंत  की  बहार में बसंत दूत कोकिला, विनीत मिष्ठ बोलती।बखान रीत गीत से, बसंत गात  डोलती। बसंत  की  बहार में, उमा महेश साथ  में।बजाय कान्ह बाँसुरी,विशेष चाल हाथ में। दिनेश  छाँव  ढूँढते , सुरेश  स्वर्ग  वासते।सुरंग  पेड़  धारते, प्रसून  काम    सालते। कली खिले बने प्रसून, भृंग संग  सोम से।खिले विशेष  चंद्रिका  मही रात व्योम से।

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हकीकत तब पता चलता है

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हकीकत तब पता चलता है हकीकत तब पता चलता है                  कौन अपना है ,कौन पराया है ,                                 ये तो वक़्त बताता है ।हकीकत तब पता चलता है जीवन में,                    जब बुरा वक़्त आता है ।।01।।न कोई दोस्त है यहां,                                 ना कोई यार है ।यह दुनियाँ भी यारों ,                       मतलब का संसार है ।।02।।बुरे वक़्त में

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निःशब्द तो नहीं

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निःशब्द तो नहीं [१]निःशब्द तो नहीं !किंचित् भी नहीं !!बस…नहीं हैं आजशहद या गुलाबी इत्र मेंडुबोयेसुंदर-सुकोमल-सुगंधित शब्दनहीं हैं आजकर्णप्रिय,रसीले,बांसुरी के तानों संगगुनगुनाते अल्फाज़…सब जल गये !भस्म हो गयेसारे के सारेअंतरिक्ष में विचरतेछंदटूट-फूटकरबिखर गये सारे अलंकारनिस्सार हो गयींसारी व्यंजनाएँलक्षणा भी हो गयीं सारीमहत्त्वहीन..अबबचे हैं तो केवलउबड़-खाबड़कंटकाकीर्णक्षिति पर पांव जमाते……कुछ शब्दजो टटोलते हैंपैरों से अपना ज़मीनपैरों के

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इन्तजार पर कविता

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इन्तजार पर कविता विसंगति छाई संसृति मेंकरदे समता का संचार।मुझे ,उन सबका इन्तजार…। जीवन की माँ ही है, रक्षकफिर कैसे बन जाती भक्षक ?फिर हत्या, हो कन्या भ्रूण की या कन्या नवजात की ।रक्षा करने अपनी संतान कीजो भरे माँ दुर्गा सा हुँकारमुझे, उस माँ का इन्तजार….। गली गली और मोड़ मोड़ परहोता शोषण छोर

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हार कर जीतना – पूनम दुबे

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हार कर जीतना – पूनम दुबे सही तो है हार कर भी,मैं जीत रही हूं,तुम्हारे लिए कभी बच्चों,के लिए कभी परिवार ,के लिए मैं हार कर भी जीत ,रही हूं,क्या हुआ अगर मेरे आत्मसम्मान परचोट लगती,है मेरे आंसुओं से क्या फर्क,पड़ता है ,बात तो ठहरजाती है ना, सबकी बातरह तो जाती है ना, मैं भी

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धर्म एक धंधा है

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धर्म एक धंधा है  गंगाधर मनबोध गांगुली “सुलेख “        समाज सुधारक ” युवा कवि “ क्या धर्म है ,क्या अधर्म है ? आज अधर्म को ही धर्म समझ बैठें हैं । धर्म से ही वर्ण व्यवस्था ,                             समाज में आया है ।धर्म ही इंसान को ,               इंसान का दुश्मन बनाया है ।।01।। वर्ण व्यवस्था बाद

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भावी पीढ़ी का आगामी भविष्य

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भावी पीढ़ी का आगामी भविष्य हमें सोचना तो पड़ेगा।परिवार की परंपरासमाज की संस्कृतिमान्यताओं का दर्शनव्यवहारिक कुशलताआदर्शों की स्थापना।निरुद्देश्य तो नहीं!महती भूमिका है इनकीसुन्दर,संतुलित और सफल जीवन जीने में। जो बढता निरंतरप्रगति की ओरदेता स्वस्थ शरीर ,सफल जीवन और सर्वहितकारी चिन्तन।हम रूढियों के संवाहक न बने।कुरीतियों की हामी भी क्यों भरें। बचें छिछले ,गँदले गड्ढों के

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