समाज और यथार्थ

patang subh makar sankranti

मकर संक्रान्ति पर सुमित्रानंदन पंत की कविता

समाज और यथार्थ

14 जनवरी के बाद से सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर (जाता हुआ) होता है। इसी कारण इस पर्व को ‘उतरायण’ (सूर्य उत्तर की ओर) भी कहते है। और इसी दिन मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है. जो की भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है।  सुमित्रानंदन पंत जन पर्व मकर संक्रांति आजउमड़ा नहान को

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गोपालकृष्ण गोखले पुण्यतिथि पर कविता

समाज और यथार्थ

इसे सुनेंगोपाल कृष्ण गोखले (9 मई 1866 – 19 फरवरी 1915) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक थे। महादेव गोविन्द रानडे के शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकारपूर्वक बहस करने की क्षमता से उन्हें भारत का ‘ग्लेडस्टोन’ कहा जाता है। गोपालकृष्ण गोखले पुण्यतिथि पर

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14 अप्रैल डॉ.भीमराव अम्बेडकर जयन्ती पर कविता

समाज और यथार्थ

भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1951), वे डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय थे उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चला 14 अप्रैल डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयन्ती पर कविता बाबा तुमको कोटि नमन सबको जीवन दान दिया है, बाबा तुमको कोटि

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25 दिसम्बर महामना मालवीय जयन्ती पर कविता

समाज और यथार्थ

शत-शत आज नमन है ● डॉ. ब्रजपाल सिंह संत देह भस्म तो उड़ जाती है, कार्य अजर-अमर है। विष्णु चरणी, शीतलता सा, हर-हर गर्जन स्वर है संकल्पों का शंख, विश्व को दे गया माणिक मोती । हिंदुस्तान बना हिंदू से, देकर गया चुनौती । ‘श्रद्धा मर्यादा’ परिभाषा, मंगलमय तन-मन है । मोहन मदन मालवीय आपको

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जवाहरलाल नेहरू

बाल-दिवस पर कविता

महत्वपूर्ण दिन आधारित कविता, समाज और यथार्थ,

बाल-दिवस पर कविता आ गया बच्चों का त्योहार/ विनोदचंद्र पांडेय ‘विनोद’ सभी में छाई नयी उमंग, खुशी की उठने लगी तरंग, हो रहे हम आनन्द-विभोर, समाया मन में हर्ष अपार ! आ गया बच्चों का त्योहार ! करें चाचा नेहरू की याद, जिन्होंने किया देश आजाद, बढ़ाया हम सबका, सम्मान, शांति की देकर नयी पुकार

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बड़ी दौलत सेहत पर कविता

समाज और यथार्थ

सेहत सबसे बड़ी दौलत है ज़िंदगी को जियो, बड़े इत्मीनान से,कटेगी ज़िंदगी, बड़े शान से!हर पल,हर घड़ी, बिना किसी तनाव से,खुशी में, करो काम, बड़े चाव से!अकेलापन महसूस होता है जब,करना चाहिए कोई काम तब,व्यस्तता रहेगी तो, समय का क्या?पता नहीं चलेगा, वक्त गुजरा कब!धन दौलत का नशा, कभी उतरता नहीं,आदमी को चाहिए, जब तक

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पिता पर कविता (Pita Par Kavita)

समाज और यथार्थ

फादर्स डे पिताओं के सम्मान में एक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला पर्व हैं जिसमे पितृत्व (फादरहुड), पितृत्व-बंधन तथा समाज में पिताओं के प्रभाव को समारोह पूर्वक मनाया जाता है। अनेक देशों में इसे जून के तीसरे रविवार, तथा बाकी देशों में अन्य दिन मनाया जाता है। यह माता के सम्मान हेतु मनाये जाने

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महिला दिवस पर कविता

महत्वपूर्ण दिन आधारित कविता, समाज और यथार्थ

बेखबर स्त्रियां स्त्रियों के सौंदर्य काअलंकृत भाषा मेंनख से शिख तक मांसल चित्रण किए गएश्रृंगार रस में डूबेसौंदर्य प्रेमी पुरुषों ने जोर-जोर से तालियां बजाईमगर तालियों की अनुगूंज मेंस्त्रियों की चित्कारकभी नहीं सुनी गईं कविताओं में स्त्रियांखूब पढ़ी गई और खूब सुनी गईमगर आदि काल से अब तककविताओं से बाहरयथार्थ के धरातल परस्त्रियां ना तो

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holi

होली पर कविता

समाज और यथार्थ,

होली पर कविता होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। प्राचीन काल में लोग चन्दन और गुलाल से ही होली खेलते थे। समय के साथ इनमें भी बदलाव देखने को मिला है। कई लोगों द्वारा प्राकृतिक रंगों का भी उपयोग किया जा रहा है, जिससे त्वचा या

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save nature

पर्यावरण दिवस के दोहे

महत्वपूर्ण दिन आधारित कविता, समाज और यथार्थ

आज पर्यावरण असंतुलन हो चुका है . पर्यावरण को सुधारने हेतु पूरा विश्व रास्ता निकाल रहा हैं। लोगों में पर्यावरण जागरूकता को जगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित विश्व पर्यावरण दिवस दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक आयोजन है। इसका मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न

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तरक्की की सीढ़ियां – गुलाबचंद जैसल

समाज और यथार्थ

गुलाबचंद जैसल द्वारा रचित तरक्की की सीढ़ियां सभी भारतीयों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कविता है । आज वह समय आ गया है कि हम तरक्की के असली मायने को समझें। तरक्की की सीढ़ियां चलो निकालें नदियों से रवाब* कोकि-जल जीवों को जीवन मिलेगाऔर –हमें स्वच्छ पानीनदियाँ भी बहती रहेंगीं।चलो निकालें घरों से पॉलिथीनकि-गाएँ मारने

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सामाजिक क्रांति के मसीहा – कांशीराम

समाज और यथार्थ

प्रस्तुत हिंदी कविता सामाजिक क्रांति के मसीहा काशीराम कवि डिजेंद्र कुर्रे कोहिनूर द्वारा रचित है जहां पर कवि ने कांशीराम जी के जीवन परिचय को काव्य का रूप दिया हुआ है। सामाजिक क्रांति के मसीहा – कांशीराम गिरे पड़े पिछड़ों कुचलों को,अपने गले लगाए थे।मानवता का धर्म जगाने,जो इस जग में आए थे। सन उन्नीस

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