होली पर्व -कुण्डलियाँ

होली पर्व पर कुण्डलियाँ ( Holi par Kundaliya) का संकलन हिंदी में रचना आपके समक्ष पेश है . होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है। 

होली पर्व – कुण्डलियाँ

Holi par kavita
Holi par kavita

होली के इस पर्व पर, मेटे सब मतभेद।
भूल गिला शिकवा सभी, खूब जताये खेद।
खूब जताये खेद, शिकायत रह क्यों पाये।
आपस मे रह प्रेम, उसे भूले कब जाये।
मदन कहै समझाय,खुशी की भर दे झोली।
जीवन हो मद मस्त, प्यार की खेलें होली।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर

होली की कविता

होली छटा निहारिए, बरस रहा मधु रंग ।
मंदिर-मस्जिद प्रेम से, खेल रहे मिल संग ।।
खेल रहे मिल संग, धर्म की भींत ढही है ।
अंतस्तल में आज, प्रीत की गंग बही है ।।
कहे दीप मतिमंद, रहे यह शुभ रंगोली ।
लाती जन मन पास, अरे मनभावन होली ।।

-अशोक दीप

होली पर पारम्परिक कथा

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के अहंकार में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।

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