जन-जन के प्रिय राम / हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’

 उनकी प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में है क्योंकि उन्होंने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता तक का त्याग किया

जन-जन के प्रिय राम / हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’

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नित सुबह, दोपहर,शाम,
तुम्हें ध्याऊॅ आठों याम।
हे जन-जन के प्रिय राम-
स्वीकारो मेरा प्रणाम।टेक।

क्षिति-जल-अम्बर तुम ही तुम हो,
सृष्टि-अनश्वर तुम ही तुम हो,
तुमसे ही गतिमान धरा है-
सौम्य,भयंकर तुम ही तुम हो।
सुर-नर-मुनि सब ध्यावें,
लखते हैं तुम्हें अविराम।
हे जन-जन के प्रिय राम,
स्वीकारो मेरा प्रणाम।1।

सत्य,न्याय के रक्षक स्वामी,
मर्यादित पथ के अनुगामी,
भेद-भाव व छुआछूत से,
दूर बहुत तुम अन्तर्यामी।
जूठे बेर तुम्हीं ने खाये,
शिला तैरती तेरे नाम।
हे जन-जन के प्रिय राम,
स्वीकारो मेरा प्रणाम।2।

मुझ सा अधम न देखा होगा,
कहीं न मेरा लेखा होगा।
कुविचारी,अविवेकी साथी,
सबके साथ बसेरा होगा।
विश्व-पूज्य कर दो भारत को,
कण-कण मोहे रूप ललाम।
हे जन-जन के प्रिय राम,
स्वीकारो मेरा प्रणाम।3।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’,
रायबरेली (उप्र)229010
9415955693

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