कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

हिंदी साहित्य जगत में अनेक सितारे हैं

हिंदी कविता

इस रचना के माध्यम से कवि नवीन रचनाकारों को भी साहित्य जगत में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास कर रहा है |

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विश्व ही परिवार है- आर आर साहू

हिंदी कविता

विश्व ही परिवार है- आर आर साहू ————— परिवार ————-ऐक्य अपनापन सुलभ सहकार है,इस धरा पर स्वर्ग वह परिवार है। मातृ,भगिनी, पितृ,भ्राता,रुप में,शक्ति-शिव आवास सा घर-द्वार है। बाँटते सुख-दुःख हिलमिल निष्कपट,है प्रथम कर्तव्य फिर अधिकार है। है तितिक्षा,त्याग,का आदर्श भी,प्रेम, मर्यादा सुदृढ़ आधार है। दृष्टि जितना और जैसा देखती,उस तरह,उतना, उसे संसार है। नीर,पावक,वायु ये

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विधाता छंद मय मुक्तक- फूल

हिंदी कविता

विधाता छंद मय मुक्तक- फूल रखूँ किस पृष्ठ के अंदर,अमानत प्यार की सँभले।भरी है डायरी पूरी,सहे जज्बात के हमले।गुलाबी फूल सा दिल है,तुम्हारे प्यार में पागल।सहे ना फूल भी दिल भी,हकीकत हैं, नहीं जुमले।.सुखों की खोज में मैने,लिखे हैं गीत अफसाने।रचे हैं छंद भी सुंदर,भरोसे वक्त बहकाने।मिला इक फूल जीवन में,तुम्हारे हाथ से केवल।रखूँगा डायरी

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प्रकृति से प्रेम पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता, ,

प्रकृति से प्रेम – रीता प्रधान प्रकृति की सुंदरता पर आधारित रचना

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hasdev jangal

प्रकृति से खिलवाड़ का फल – महदीप जंघेल

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

प्रकृति से खिलवाड़ और अनावश्यक विनाश करने का गंभीर परिणाम हमे भुगतना पड़ेगा। जिसके जिम्मेदार हम स्वयं होंगे।
समय रहते संभल जाएं। प्रकृति बिना मांगे हमे सब कुछ देती है।उनका आदर और सम्मान करें। संरक्षण करें।

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hasdev jangal

प्रकृति से खिलवाड़/बिगड़ता संतुलन-अशोक शर्मा

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

भौतिकता की होड़ में मानव ने प्रकृति के साथ बहुत छेड़छाड़ की है। अपने विकास की मद में खोया मानव पर्यावरण संतुलन को भूल गया है। इस प्रकार के कृत्यों से ही आज कोरोना जैसी महामारी से मानव जीवन के अस्तित्व खतरे में दिख रहा है।

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विधाता छंद में प्रार्थना

समाज और यथार्थ

विधाता छंद में प्रार्थना विधाता छंद१२२२ १२२२, १२२२ १२२२. प्रार्थना.सुनो ईश्वर यही विनती,यही अरमान परमात्मा।मनुजता भाव मुझ में हों,बनूँ मानव सुजन आत्मा।.रहूँ पथ सत्य पर चलता,सदा आतम उजाले हो।करूँ इंसान की सेवा,इरादे भी निराले हो।.गरीबों को सतत ऊँचा,उठाकर मान दे देना।यतीमों की करो रक्षा,भले अरमान दे देना।.प्रभो संसार की बाधा,भले मुझको सभी देना।रखो ऐसी कृपा

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हम तुम दोनों मिल जाएँ

समाज और यथार्थ,

हम तुम दोनों मिल जाएँ मुक्तक (१६मात्रिक) हम-तुम हम तुम मिल नव साज सजाएँ,आओ अपना देश बनाएँ।अधिकारों की होड़ छोड़ दें,कर्तव्यों की होड़ लगाएँ। हम तुम मिलें समाज सुधारें,रीत प्रीत के गीत बघारें।छोड़ कुरीति कुचालें सारी,आओ नया समाज सँवारें। हम तुम मिल नवरस में गाएँ,गीत नए नव पौध लगाएँ।ढहते भले पुराने बरगद,हम तुम मिल नव

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