16 मात्रिक मुक्तक

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अब तो मन का रावण मारें(१६ मात्रिक गीत)

अब तो मन का रावण मारें (१६ मात्रिक गीत) बहुत जलाए पुतले मिलकर,अब तो मन का रावण मारे। जन्म लिये तब लगे राम से,खेले कृष्ण कन्हैया लगते।जल्दी ही वे लाड़ गये सब,विद्यालय में पढ़ने भगते।मिल के पढ़ते पाठ विहँसते,खेले भी हम साँझ सकारे।मन का मैं अब लगा सताने,अब तो मन का रावण मारें। होते युवा …

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वर्षा ऋतु विशेष कविता

बरस मेघ खुशहाली आए

बरस मेघ खुशहाली आए बरसे जब बरसात रुहानी,धरा बने यह सरस सुहानी।दादुर, चातक, मोर, पपीहे,फसल खेत हरियाली गाए,बरस मेघ, खुशहाली आए।। धरती तपती नदियाँ सूखी,सरवर,ताल पोखरी रूखी।वन्य जीव,पंछी हैं व्याकुल,तुम बिन कैसे थाल सजाए,बरस मेघ, खुशहाली आए।। कृषक ताकता पशु धन हारे,भूख तुम्हे अब भूख पुकारे,घर भी गिरवी, कर्जा बाकी,अब ये खेत नहीं बिक जाए,बरस …

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हम तुम दोनों मिल जाएँ

हम तुम दोनों मिल जाएँ मुक्तक (१६मात्रिक) हम-तुम हम तुम मिल नव साज सजाएँ,आओ अपना देश बनाएँ।अधिकारों की होड़ छोड़ दें,कर्तव्यों की होड़ लगाएँ। हम तुम मिलें समाज सुधारें,रीत प्रीत के गीत बघारें।छोड़ कुरीति कुचालें सारी,आओ नया समाज सँवारें। हम तुम मिल नवरस में गाएँ,गीत नए नव पौध लगाएँ।ढहते भले पुराने बरगद,हम तुम मिल नव …

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धर्मपत्नी पर कविता

धर्मपत्नी पर कविता ( विधाता छंद, २८ मात्रिक ) हमारे देश में साथी,सदा रिश्ते मचलते है।सहे रिश्ते कभी जाते,कभी रिश्ते छलकते हैं। बहुत मजबूत ये रिश्ते,मगर मजबूर भी देखे।कभी मिल जान देते थे,गमों से चूर भी देखे। करें सम्मान नारी का,करो लोगों न अय्यारी।ठगी जाती हमेशा से,वहीं संसार भर नारी। हमारी धर्म पत्नी को,कहीं गृहिणी …

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सुख-दुख की बातें बेमानी

सुख-दुख की बातें बेमानी ( १६ मात्रिक ) मैने तो हर पीड़ा झेली,सुख-दुख की बातें बेमानी। दुख ही मेरा सच्चा साथी,श्वाँस श्वाँस मे रहे संगाती।मै तो केवल दुख ही जानूं,प्रीत रीत मैने कब जानी,सुख-दुख की बातें बेमानी। साथी सुख केवल छलना है,मुझे निरंतर पथ चलना है।बाधाओं से कब रुक पाया,जब जब मैने मन में ठानी,सुख-दुख …

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अब तो मेरे गाँव में

अब तो मेरे गाँव में . ( १६,१३ )अमन चैन खुशहाली बढ़ती ,अब तो मेरे गाँव में,हाय हलो गुडनाइट बोले,मोबाइल अब गाँव में। टेढ़ी ,बाँकी टूटी सड़केंधचके खाती कार में,नेता अफसर डाँक्टर आते,अब तो कभी कभार में। पण्चू दादा हुक्का खैंचे,चिलम चले चौपाल मे,गप्पेमारी ताश चौकड़ी,खाँप चले हर हाल में। रम्बू बकरी भेड़ चराता,घटते लुटते …

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उड़ जाए यह मन

उड़ जाए यह मन (१६ मात्रिक) यह,मन पागल, पंछी जैसे,मुक्त गगन में उड़ता ऐसे।पल मे देश विदेशों विचरण,कभी रुष्ट,पल मे अभिनंदन,मुक्त गगन उड़ जाए यह मन। पल में अवध,परिक्रम करता,सरयू जल मन गागर भरता।पल में चित्र कूट जा पहुँचे,अनुसुइया के आश्रम पावन,मुक्त गगन उड़ जाए यह मन। पल शबरी के आश्रम जाए,बेर, गुठलियाँ मिलकर खाए।किष्किन्धा …

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समय सतत चलता है साथी

समय सतत चलता है साथी गीत(१६,१६) कठिन काल करनी कविताई!कविता संगत प्रीत मिताई!! समय सतत चलता है साथी,समय कहे मन त्याग ढ़िठाई।वक्त सगा नहीं रहा किसी का,वन वन भटके थे रघुराई।फुरसत के क्षण ढूँढ करें हमकविता संगत प्रीत मिताई। समय चक्र है ईष्ट सत्यता,वक्त सिकंदर,वक्त कल्पना।वक्त धार संग बहना साथी,मत देखे मन झूठा सपना।कठिन कर्म,पर्वत …

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आओ सच्चेे मीत बनाएँ

आओ सच्चेे मीत बनाएँ (१६,१६)आओ सच्चेे मीत बनाएँ,एक एक हम वृक्ष लगाएँ।बचपन में ये सुन्दर होते ,नेह स्नेह के भाव सँजोते। पालो पोषो गौरव होता।मधुर भाव हरियाली बोता।आज एक पौधा ले आएँ,आओ सच्चे मीत बनाएँ। यौवन मे छाँया दातारी,मीठे खट्टे फल खग यारी।चिड़िया,मैना पिक शुक आए,मधुर सरस संगीत सुनाए। सुन्दर नीड़,बसेरे सजते।पावन पंछी कलरव बजते।प्राण …

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वर्षा-विरहातप

वर्षा-विरहातप (१६ मात्रिक मुक्तक ) कहाँ छिपी तुम,वर्षा जाकर।चली कहाँ हो दर्श दिखाकर।तन तपता है सतत वियोगी,देखें क्रोधित हुआ दिवाकर। मेह विरह में सब दुखियारे,पपिहा चातक मोर पियारे।श्वेद अश्रु झरते नर तन से,भीषण विरहातप के मारे। दादुर कोकिल निरे हुए हैं,कागों से मन डरे हुए हैं।तन मन मेरे दोनो व्याकुल,आशंकी घन भरे हुए है। बालक …

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