कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

मतदान विषय पर दोहे- बाबू लाल शर्मा

नारी जीवन और संवेदना

मतदान विषय पर दोहे- बाबू लाल शर्मा सोच समझ मतदान (दोहा-छंद)1.मत अयोग्य को दें नहीं, चाहे हो वह खास।वोट देय हम योग्य को, सब जन करते आस।। 2.समझे क्यों जागीर वे, जनमत के मत भूल।उनको मत देना नहीं, जिनके नहीं उसूल।। 3.एक वोट शमशीर है, करे जीत या हार।इसीलिए मतदान कर, एक वोट सरकार।। 4.मतदाता […]

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शुभकामना विषय पर दोहा -बाबू लाल शर्मा

समाज और यथार्थ

शुभकामना विषय पर दोहा -बाबू लाल शर्मा करूँ सदा शुभ कामना, उन्नत होवे देश।भूमण्डल सरनाम हो, उज्ज्वल हो परिवेश।। देश वासियों के लिये, नये साल संदेश।जनता को शुभकामना, खुशियाँ सभी प्रदेश।। सामाजिक परिवेश में, मानव मान समाज।सबके हित शुभकामना, नये साल की आज।। नारी को शुभकामना, मैं देता करजोर।शक्ति देश की ये बने, बढ़े उन्नति

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मकर से ऋतुराज बसंत (दोहा छंद)-बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

मकर से ऋतुराज बसंत (दोहा छंद)-बाबू लाल शर्मा सूरज जाए मकर में, तिल तिल बढ़ती धूप।फसले सधवा नारि का, बढ़ता रूप स्वरूप।।.पशुधन कीट पतंग भी, नवजीवन मम देश।वन्य जीव पौधे सभी, कली खिले परिवेश।।.तितली भँवरे मोर पिक, करते हैं मनुहार।ऋतु बसंत के आगमन, स्वागत करते द्वार।।.मानस बदले वसन ज्यों, द्रुम दल बदले पात।ऋतु राजा जल्दी

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वट सावित्री पूजा पर दोहे -बाबू लाल शर्मा

नारी जीवन और संवेदना

वट सावित्री पूजा पर दोहे -बाबू लाल शर्मा वट सावित्री पूज कर, जो रखती उपवास।धन्य धन्य है भारती, प्राकत नारी आस।। ढूँढे पूजन के लिए, बरगद दुर्लभ पेड़।पथ भी दुर्गम हो रहे, हुई कँटीली मेड़।। पेड़ सभी है काम के, रखना इनका ध्यान।दीर्घ आयु होता सखे, वट का पेड़ महान।। पुत्र सरीखे पालिए, सादर तात

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गोवर्धन विषय पर दोहे -बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

गोवर्धन विषय पर दोहे -बाबू लाल शर्मा (दोहा छंद)गिरि गोवर्धन नख धरे, करे वृष्टि से रक्ष!दिए चुनौती इन्द्र को, जन गोधन के पक्ष!! महिमा हुई पहाड़ की, करे परिक्रम लोग!मानस गंगा पावनी, गिरिधर पूजन भोग!! द्वापर में संदेश वर, दिया कृष्ण भगवान!गो,गोधन पशुधन भले, कृषि किसान सम्मान!! भारत कृषक प्रधान है, गोधन वर धन मान!कृष्ण

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mahatma gandhi

बापूजी पर दोहे -बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

बापूजी पर दोहे -बाबू लाल शर्मा भारत ने थी ली पहन, गुलामियत जंजीर।थी अंग्रेज़ी क्रूरता, मरे वतन के वीर।। काले पानी की सजा, फाँसी हाँसी खेल।गोली गाली साथ ही , भर देते थे जेल।। याद करे जब देश वह, जलियाँवाला बाग।कायर डायर क्रूर ने, खेला खूनी फाग।। मोहन, मोहन दास बन, मानो जन्मे देश।पढ़लिख बने

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struggle

हम होंगे कामयाब – गिरिजाकुमार माथुर

हिंदी कविता

हम होंगे कामयाब – गिरिजाकुमार माथुर हम होंगे कामयाब,हम होंगे कामयाब,हम होंगे कामयाब एक दिन,मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास,हम होंगे कामयाब एक दिन होगी शान्ति चारों ओर,होगी शान्ति चारों ओर,होगी शान्ति चारों ओर एक दिन,मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास,होगी शान्ति चारों ओर एक दिन। नहीं डर किसी का आज,नहीं भय किसी

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सैनिक व सिपाही को अर्पित दोहा पच्चीसी

मन और भावनाएँ, ,

सैनिक व सिपाही को अर्पित दोहा पच्चीसी १बलिदानी पोशाक है, सैन्य पुलिस परिधान।खाकी वर्दी मातृ भू, नमन शहादत मान।। २खाकी वर्दी गर्व से, रखना स्व अभिमान।रक्षण गुरुतर भार है, तुमसे देश महान।। ३सत्ता शासन स्थिर नहीं, है स्थिर सैनिक शान।देश विकासी स्तंभ है, सेना पुलिस समान।। ४देश धरा अरु धर्म हित, मरते वीर सपूत।मातृभूमि मर्याद

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हिंदी संग्रह कविता- माँ! बस यह वरदान चाहिए

हिंदी कविता

माँ! बस यह वरदान चाहिए माँ बस यह वरदान चाहिए।जीवन-पथ जो कंटकमय हो, विपदाओं का घोर विलय हो।किन्तु कामना एक यही बस, प्रतिपल पग गतिमान चाहिए। माँ … हास मिले या त्रास मिले, विश्वास मिले या फास मिले।गरजे क्यों न काल सम्मुख, जीवन का अभिमान चाहिए॥ माँ… जीवन के इन संघर्षों में, दुःख – कष्ट

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हरिवंशराय बच्चन की १० लोकप्रिय रचनाएँ

मन और भावनाएँ

हरिवंशराय बच्चन की १० लोकप्रिय रचनाएँ सादर प्रस्तुत हैं आत्‍मपरिचय / हरिवंशराय बच्‍चन मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकरमैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ! मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,जग

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उठो स्वदेश के लिए -वंशीधर शुक्ल

हिंदी कविता

उठो स्वदेश के लिए -वंशीधर शुक्ल उठो स्वदेश के लिए, बने कराल काल तुम,उठो स्वदेश के लिए, बने विशाल ढाल तुम! उठो हिमाद्रि शृंग से, तुम्हें प्रजा पुकारती,उठो प्रशस्त पन्थ पर, बढ़ो सुबुद्ध भारती!जगो विराट देश के, तरुण तुम्हें निहारते,जगो अचल, मचल, विकल, करुण तुम्हें दुलारते । बढ़ो नयी जवानियाँ, सर्जी कि शीश झुक गए,बढ़ो

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