मनीभाई नवरत्न की कविता

jeb aur jism

“जेब और जिस्म की शादी”

समाज और यथार्थ

“जेब और जिस्म की शादी” शादी—एक ऐसा शब्दजिसके भीतर प्रेम से ज़्यादाभ्रम रहता है।हम सोचते हैंहम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—पर सच मेंहम उसके भीतर नहीं देखते,सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं। लड़की की दृष्टिलड़के की जेब में उतरती है—वह भविष्य नहीं ढूँढती,भविष्य की गारंटी ढूँढती है।जैसे मनुष्य नहीं,एक बीमा पॉलिसी चुन रही होजिस […]

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भारत छोडो आन्दोलन

सवाल ही पहली क्रांति / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सवाल ही पहली क्रांति हुकूमत करने वालेसिर्फ़ दो-चार,कुर्सी पर बैठे,कलम और बंदूक के सहारेअपने को विशाल समझते हैं।मानने वालेहज़ारों नहीं,लाखों में—फिर भी सिर झुकाए,नज़रें ज़मीन पर टिकी हुई। डर की भाषासबको समझाई जाती है—कभी नौकरी का डर,कभी रोटी का,कभी जेल का,तो कभी बदनामी का।शासन तलवार से नहीं चलता,चलता हैदिलों में भरे गए डर से। दो-चार

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समझ / मनीभाई नवरत्न

मन और भावनाएँ

समझजानकारी नहीं है।जो पढ़ ली जाए,याद कर ली जाए—वह समझ नहीं। समझवह हैजो देखने के बादबदलने को विवश कर दे। जो सच दिखा देऔर फिरपुराना बने रहनाअसंभव कर दे—वही समझ है। समझभावना नहीं है।आँसू आ जाएँ,दिल भर आए—यह संवेदना हो सकती है,समझ नहीं। समझतब होती हैजब आँसू नहीं,भ्रम गिरते हैं। जबदोष देना छूटता है,शिकायत थमती

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सवाल / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सवाल (अतुकांत कविता) सवालवह नहीं जो किताब में छपा हो,सवाल वह हैजो मन में चुभे। सवालवह नहीं जो उत्तर माँगे,सवाल वह हैजो नींद छीन ले। जब बाहर ठीक दिखता हो,और भीतर कुछ ठीक न लगे—वहीं सेसवाल जन्म लेता है। सवालभीड़ से नहीं आता,सवालअकेलेपन मेंखुद से टकराकरउभरता है। जो कहा गया हैउसे मान लेना आसान है,पर“क्यों?”

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कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ

समाज और यथार्थ

यह कविता आधुनिक समाज की सोच, जीवन-शैली और दिखावटी प्रगति पर तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक प्रहार है। कवि आज के व्यक्ति को आईना दिखाता है, जो तकनीक, ट्रेंड और तथाकथित सफलता में उलझकर जीवन के मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है।

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लाओ–सू : मार्ग का महागुरु -मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

लाओ–सू : मार्ग का महागुरु प्राचीन चीन के धूसर बादलोंऔर शांत पर्वतों के बीचएक आत्मा जन्मी—जिसे संसार ने पुकारा—लाओ–सू,अर्थात् “आदरणीय वृद्ध गुरु”। इतिहास धुँधला है,समय की धूल पन्नों पर जमी है—कुछ कहते—वह मिथक था,कुछ कहते—कई महान आत्माओं काएक संयुक्त स्वरूप।पर सत्य यह है—ज्ञान जब जन्म लेता है,तो व्यक्ति नहीं, विचार बनकर जीता है। कहते हैं—वह

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अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा - मनीभाई नवरत्न

अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा – मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा गर्भ से ही सत्य बोलने काजिसे वरदान मिला,वह था अष्टावक्र—आठ वक्रों वाला,पर भीतर सेअद्भुत तेज लियेजन्मा एक बाल ऋषि। पिता कहोड़ वेद पढ़ाते,पर एक दिन उच्चारण में त्रुटि हुई—और गर्भ में पलता बालकजैसे ही बोला—“पिताजी, यह पाठ गलत है”—तो क्रोध में दुखित मन नेउसे शाप दे दिया—“टेढ़ा होगा तू आठ

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चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक – मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक बारह फ़रवरी की सुबहएक बालक जन्मा इंग्लैंड में—शांत, सरल, परआँखों में छिपा थाअनवरत खोज का प्रकाश। उसके मन में प्रश्न थे—पेड़ क्यों बढ़ते हैं?पक्षी क्यों बदलते हैं?कछुओं के खोल अलग क्यों?फूलों के रंग भिन्न क्यों?और जीवन इतना विविधफिर भी एक जैसा क्यों? डार्विन—जिसने इन प्रश्नों कोवैज्ञानिक साहस में बदला।

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अरस्तू

अरस्तू : ज्ञान का आकाश – मनीभाई नवरत्न

समय और जीवन दर्शन

अरस्तू : ज्ञान का आकाश — एक प्रेरक, दीर्घ, मौलिक कविता स्टैगिरा की मिट्टी मेंएक बालक जन्मा—शांत-सा, जिज्ञासु-सा,पर दृष्टि में छिपी थीविचारों की बिजली। उसके पिताराजदरबार के वैद्य थे,इसलिए राजमहलों की छायाउसके बचपन पर पड़ी,पर उस बालक का मनवैभव में नहीं,विचारों की खोज में रम गया। अरस्तू—जिसका नामआज भी ज्ञान के आकाश परध्रुवतारे-सा स्थिर है।

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सुकरात

सुकरात : सत्य का साहस / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सुकरात : सत्य का साहस (मौलिक प्रेरक कविता) एथेंस की गलियों मेंएक साधारण-सा व्यक्तिनंगे पाँव चलता था—कपड़ा फटा हुआ,चेहरा साधारण,पर विचार अप्रतिम। वह रुकता,लोगों से प्रश्न करता,फिर मुस्कुराकर कहता—“मैं कुछ नहीं जानता,बस इतना जानता हूँकि मैं अज्ञानी हूँ।” और इसी स्वीकार सेवह जगत कासबसे बड़ा ज्ञानी बन गया। सुकरात—जिसने ज्ञान कोशब्दों में नहीं,प्रश्नों में खोजा।

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अस्तित्व

जिज्ञासा – मनीभाई नवरत्न

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

जिज्ञासा / विज्ञान विषय पर कविता (लंबी प्रेरक कविता) जिज्ञासा—मन के भीतर जन्म लेने वालीवह छोटी-सी चिनगारी हैजो साधारण-से इंसान कोअसाधारण बनने की राह दिखाती है। यह एक प्रश्न से शुरू होती है—“यह ऐसा क्यों है?”और फिरप्रश्नों की यह श्रृंखलाइतनी लंबी हो जाती हैकि एक दिनवह पूरी दुनिया को बदल देती है। जिज्ञासा ही तो

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स्वामी विवेकानन्द : जागरण का महागान / मनीभाई नवरत्न

आध्यात्म और भक्ति

स्वामी विवेकानन्द : जागरण का महागान (अतुकांत, मौलिक कविता) भारत की भूमिवह तपोभूमि हैजहाँ ऋषियों की वाणीअभी भी वायु में गूँजती है।उसी भूमि नेउन्नीसवीं शताब्दी मेंएक ऐसी तेजस्वी आत्मा को जन्म दियाजिसने आत्मा की रोशनी सेसमूची मानवता को दिशा दी—स्वामी विवेकानन्द। वे केवल संन्यासी नहीं थे,वे आधुनिक युग के महर्षि थे—तर्क और श्रद्धा का अद्भुत

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