🛍️ उपभोग का पहाड़ 🛍️
वे बाज़ार जाते हैं
बस एक कपड़ा लेने,
पर लौटते हैं —
थैले से लदे,
मन से खाली।
आवश्यकता दरवाज़े पर रह जाती है,
लालच भीतर कुर्सी पर बैठ जाता है।
“सेल चल रही है”,
“एक खरीदो एक मुफ़्त पाओ” —
ये जादू के शब्द हैं,
जो मनुष्य को वस्तु बना देते हैं।
दुकानों में अब वस्त्र नहीं,
स्वप्न टंगे हैं हैंगरों पर —
हर कोना चमकता है,
जैसे तृष्णा को सजाया गया हो
रंगीन लाइटों में।
वे सोचते हैं —
“थोड़ा और ले लूँ, कल काम आ जाएगा,”
पर कल आता है,
नए विज्ञापन के साथ।
घर अब घर नहीं रहे,
गोदाम बन गए हैं —
जहाँ कपड़ों के ढेर पर
मनुष्य अपनी खालीपन ढँकता है।
धरती पर
कपड़ों का पहाड़ बढ़ता जा रहा है,
पर आत्मा नंगी की नंगी है।
एक समय था,
कपड़े शरीर ढकते थे —
अब वे चेतना को ढकते हैं।
जो पहना नहीं जाता,
वह फेंका जाता है —
और जो फेंका जाता है,
वह प्रकृति के आँसू में बदल जाता है।
हे मानव!
तू वस्त्र नहीं खरीदता,
तू अपनी विवेक की कीमत चुका रहा है।
कभी बाज़ार से लौटकर
आईने में खुद को देख —
क्या तू वस्त्रों में सज गया है
या वस्त्रों ने तुझे ढँक लिया है?
– मनीभाई नवरत्न





