“पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम”
वे तुम्हें बताते हैं—
तुम अधूरे हो।
आईने में नहीं,
विज्ञापन में दिखाते हैं
तुम्हारा चेहरा।
कहते हैं—
तुम जैसे हो,
वैसे काफ़ी नहीं।
यहीं से
सौदा शुरू होता है।
पहले
मन में
कमी बोई जाती है—
तुम सफल नहीं,
तुम सुंदर नहीं,
तुम योग्य नहीं।
फिर मुस्कराकर
मरहम बढ़ाया जाता है—
हमारे लिए काम करो,
हमारी परिभाषा का
सपना देखो,
हमारी चीज़ें ख़रीदो—
तभी
तुम पूरे होओगे।
स्कूल ने कहा—
अंक नहीं,
तो तुम कुछ नहीं।
समाज ने कहा—
पद नहीं,
तो पहचान नहीं।
प्रेम ने भी
शर्त रख दी—
पहले साबित करो,
फिर प्यार मिलेगा।
और तुम
तालियों के भूखे
कलाकार बन गए—
हर दिन
अपनी क़ीमत
दिखाते हुए।
यहीं
नुक़सान हुआ।
तुम्हें
ख़ुद से
शांत रहना नहीं सिखाया गया,
तुम्हें
दौड़ना सिखाया गया।
सुनो—
तुम्हारे साथ
मूल रूप से
कुछ भी ग़लत नहीं है।
तुम्हारी बेचैनी,
तुम्हारी घबराहट,
तुम्हारी भागदौड़—
सब
एक झूठ से पैदा हुई है—
कि तुम अधूरे हो।
यह झूठ
गिरा दो।
कीचड़ में पड़ा
हीरा
अपनी चमक नहीं खोता।
तुम वही हीरा हो।
जो खुद को छोटा मानते हैं,
वे
दूसरों को छोटा करते हैं।
जो डरे हुए हैं,
वे
डर फैलाते हैं।
पर जो
अपने पूरेपन में जीते हैं,
वे
नाचते हैं—
बिना कारण।
जीवन का उद्देश्य
पूरा होना नहीं,
पूरापन खोजने दौड़ना नहीं—
जीवन का अर्थ है
जो पहले से है,
उसे
उघाड़ देना।
और फिर
उसी से
निडर होकर
जीना।





