“वे प्रेम करते हैं—या सीमित?”

“वे प्रेम करते हैं—या सीमित?”

अगर तुम्हारा उठना
किसी को चुभता है,
तो पूछो—
यह प्रेम है
या
डर?

जब तुम
ऊँचाई की ओर बढ़ते हो,
और आसपास के लोग
आहत हो जाते हैं—
तो सच यह नहीं
कि तुम गलत हो,
सच यह है
कि वे रुकना चाहते हैं।

प्रेम
कभी
जंजीर नहीं डालता।

प्रेम कहता है—
जाओ,
और भी ऊपर जाओ,
चाहे
मैं पीछे रह जाऊँ।

जो तुम्हारे सपनों से
असुरक्षित हो जाए,
जो तुम्हारी उड़ान को
अपमान समझे—
वह
तुम्हें चाहता नहीं,
वह
तुम्हें अपने कद तक
घसीटना चाहता है।

वे सिर्फ़
साथ चलने से इंकार नहीं करते,
वे
रास्ता रोकते हैं।

छोटापन
बंधन है।

महानता
मुक्ति है।

और शत्रु
हमेशा बाहर नहीं होता—
शत्रु वही है
जो मुस्कराते हुए
कहे—
“इतना भी ऊपर
मत जाओ।”

क्योंकि
जो तुम्हें छोटा रखना चाहता है,
वही
तुम्हारी स्वतंत्रता से
डरता है।
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