“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़”
(एक सवाल की शक्ल में कविता)
हमने क़सम खाई थी
इक धरती की,
जहाँ मज़हब से ऊपर होगी इंसानियत।
पर मंदिर-मस्जिद की दीवारों ने ,
सोचा नहीं था
घुटती संविधान की आहट?
संविधान पे तो लिखा है —
“सब धर्म समान”,
पर ज़ुबानों पे क्यों
नफ़रत के बयान?
राज सत्ता हो निष्पक्ष,
अगर यही है बात,
पर जनता खुद बँटी हो,
क्या फिर भी है सौगात?
धर्म आस्था है —
निजी, गहरी, सच्ची,
पर जब तलवार बन जाए,
तो बनती है कच्ची।
ईश्वर भी रोता होगा,
जो देखे —
उसके नाम पे जले कोई बस्ती ।
संविधान कहे —
ना हो पक्षपात,
ना हो भेद,
ना हो जात-पात।
फिर क्यों धर्म की अंधदौड़ में,
इंसानियत खा रही मात?
शायद सवाल ये नहीं
कि कौन धार्मिक है,
सवाल है —
क्या हम मानव भी हैं?
क्योंकि धर्म जब प्रेम सिखाए, वो पूजा है,
पर जब नफ़रत उगले —
वो साज़िश है, दवा दुआ नहीं।
-मनीभाई नवरत्न





