ज़िंदगी ही आईना

ज़िंदगी ही आईना

हम भागते रहते हैं,
इतनी तेज़ी से
कि अपनी ही परछाईं
पीछे छूट जाती है।

शोर में जीते हुए
हमने चुप्पी से
आँख मिलाना छोड़ दिया।
क्योंकि चुप्पी
सवाल पूछती है।

रुको—
और देखो,
तुम असल में कर क्या रहे हो?
किस डर ने तुम्हें
इतना व्यस्त बना रखा है?

क्यों अकेलेपन की
हल्की-सी आहट
तुम्हें बेचैन कर देती है?
क्यों भविष्य
उम्मीद और डर के बीच
झूलता रहता है?

तुम कहते हो—
मैं जी रहा हूँ,
पर क्या तुम जानते हो
जीने का मतलब?

ये दर्शन नहीं,
ये तुम्हारे दिन हैं,
तुम्हारी रातें हैं,
तुम्हारी आदतें हैं।

तुमने एक ढर्रे को
सामान्य मान लिया,
बिना देखे,
बिना पूछे।

जिस तेज़ नज़र से
दुनिया को परखते हो,
उसी नज़र से
खुद को क्यों नहीं देखते?

यह तुम्हारी ज़िंदगी है—
एक ही बार की,
नाज़ुक,
अनमोल।

इसे समाज की आँखों से नहीं,
उधार लिए मूल्यों से नहीं,
खुली जागरूकता से देखो।

देखो
तुम किसके पीछे भागते हो,
किससे डरते हो,
क्या बार-बार दोहराते हो।

कोई बहाना नहीं,
कोई नाटक नहीं—
सिर्फ़ साफ़ देखना।

और जब मन
खुद को सच में देखने लगता है,
तो कोई सस्ती खुशी नहीं,
एक गहरी स्पष्टता जन्म लेती है।

उत्साह नहीं,
जीवन-शक्ति।
आराम नहीं,
मुक्ति।

वही स्पष्टता
तुम्हारी सर्वोच्च संभावना है।
और उसे
तुमसे कोई नहीं छीन सकता—
न अतीत,
न पीड़ा,
न विश्वास।

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