पीठ पीछे कुछ टिक रहा है
समय को सँभालने के उपाय मत पूछो,
खुद को सँभालना सीखो।
तुम्हारे घंटे,
तुम्हारे मिनट—
वे घड़ी नहीं,
आईना हैं।
उनमें दिखता है
तुम्हारा मन,
तुम्हारी प्राथमिकताएँ,
तुम्हारे असली मूल्य।
ट्रेन छूटे तो समझ आता है—
समय लौटता नहीं।
मौत छुए तो दिखता है—
समय अनंत नहीं,
हर सेकंड वाष्पित हो रहा है।
पर अजीब भ्रम है—
सब कुछ जाएगा,
पर मैं नहीं।
ट्रेन जाएगी,
फ़्लाइट उड़ेगी,
डेडलाइन गुज़रेगी—
पर मैं यहीं रहूँगा।
यही सबसे बड़ी भूल है—
व्यक्तिगत अमरता का भ्रम।
आज तुम युवा हो—
पच्चीस,
पैंतीस—
पर अगर जीवन
सिर्फ़ तीन दिन का होता,
तो एक दिन
पहले ही बीत चुका है।
न सौ साल,
न अनंत समय—
हक़ीक़त में
पचहत्तर,
अस्सी…
और वह भी तय नहीं।
तो क्या बचा?
कोई विशाल कैनवास नहीं।
बस दो दिन।
एक जा चुका।
दो अस्थायी।
यह समझ आ जाए
तो कैलेंडर नहीं भरते।
खुद को निखारते हैं।
क्योंकि
जब तुम खुद को सँभाल लेते हो,
समय
अपने आप
लाइन में आ जाता है।





