मनोरंजन नाम की सज़ा
(The Punishment Called Entertainment)
तुम मनोरंजन ढूँढते हो
क्योंकि भीतर
गहरी ऊब है।
जो जीवन से भाग रहा है,
वही सबसे ज़्यादा
हँसता दिखता है।
और जो साहस करता है,
वह अक्सर
चुप और गंभीर।
जिसे तुम आनंद कहते हो,
वह केवल उत्तेजना है—
थोड़ी देर की गुदगुदी।
इसे कोई भी दयनीय पा सकता है,
और यही
उसकी सज़ा है।
यदि तुम्हें लगातार मज़ा चाहिए,
तो समझो—
यही दंड है।
डर पर जीत में
क्या आनंद नहीं?
नई खोज में
क्या रोमांच नहीं?
प्रेम में
क्या उन्माद नहीं?
फिर क्यों चाहिए
अतिरिक्त डोज़—
डोपामिन की,
शोर की,
भीड़ की?
सप्ताहांत पर
मॉल क्यों भर जाते हैं?
क्योंकि
सप्ताह
खाली गया।
जब सप्ताह सड़ा हो,
तो सप्ताहांत
सनसनी माँगता है।
पाँच दिन
बुरा जीवन सहो,
ताकि दो दिन
पैसे उड़ा सको—
यह सौदा
अक्लमंदी का नहीं।
मनोरंजन
कोई इनाम नहीं।
यह उस जीवन की सज़ा है
जिसे जीने का
साहस नहीं किया गया।





