न ट्रॉफी, बस खेल (No Trophies, Just Play)
जब भीतर पूर्ण हो,
तो दुनिया से
साथ माँगने नहीं जाते।
जब भीतर पूर्ण हो,
तो दुनिया से
कोई शिकायत भी नहीं रहती।
तब कर्म होता है—
तेज़, जीवंत,
पर फल की भीख के बिना।
कहते हैं जीवन को
कोई प्रेरक चाहिए।
पर क्या वह प्रेरणा
हीनता और कमी की भावना होनी चाहिए?
हम जमा करते रहते हैं—
चीज़ें,
सुरक्षा,
पहचान—
मानो भीतर कुछ अधूरा हो।
यह विश्वास
हमने सीखा है।
जन्म से ही
सिखाया गया—
पहले कुछ बनो,
तब पूरे कहलाओ।
लक्ष्य बुरे नहीं हैं।
उन्हें पाना भी गलत नहीं।
गलत है
अंदर की तृप्ति
बाहर से माँगना।
जब शुरुआत पूर्णता से होती है,
तो हर प्रयास
पूर्णता की सुगंध लिए होता है।
परिणाम आए या न आए,
भीतर कुछ नहीं टूटता।
बाहर हार-जीत होगी।
पर भीतर असफलता
तभी जन्म लेती है
जब परिणाम पर
मन निर्भर हो जाता है।
जब पहचान दाँव पर हो,
तभी हार
घाव बनती है।
यदि तुम पहले से ही
स्वीकार कर लो—
मैं सफल हूँ—
तो असफलता
ठहर ही नहीं पाती।
तुम्हारी असली पहचान
किसी उपलब्धि की मोहताज नहीं।
दुनिया एक खेल का मैदान है—
जहाँ खेलने की खुशी है,
पर कोई ट्रॉफी
ले जाने को नहीं।
अब जाओ—
निडर होकर खेलो।





