सुख से परे
जीवन का उद्देश्य
सुख नहीं है,
सुख पाने की
बेचैनी से मुक्ति है।
पैसा?
सफलता?
खुशी?
इतने छोटे लक्ष्य
इतने विशाल जीवन के लिए—
कितनी अजीब सौदेबाज़ी।
जिस सुख को
तुम जानते हो,
वह सिखाया गया है,
पालित है,
क्षणिक उत्तेजना का
नाम बदल दिया गया है।
और वह
दुख के बिना
जी ही नहीं सकता।
सुख चाहिए
तो पहले दुख चाहिए—
गहरा सुख चाहिए
तो गहरा दुख चाहिए।
यही है
खुशी का
छुपा हुआ
अर्थहीन तंत्र।
आनंद
कुछ और है।
आनंद
बिना कारण है,
बिना शर्त है,
बिना प्रतिक्रिया है।
वह
मिलता नहीं,
हटता है—
परतों के हटने पर
प्रकट होता है।
जिस मन पर
हज़ारों संस्कारों का
भार नहीं,
वही
प्रेम जानता है।
वही
आनंद जानता है।
मुक्त व्यक्ति
दुख से भी मुक्त है,
और
सुख की लालसा से भी।
वह
सुख के पीछे नहीं भागता,
दुख से भागता भी नहीं।
वह
हल्का है।
सचेत है।
स्पष्ट है।
और यही स्पष्टता
प्रेम है।
और यही प्रेम—
जीवन का
एकमात्र
निःसंदेह
उद्देश्य।





