उद्यमिता : पेशा नहीं, पुकार
पूछना चाहिए—
जीवन क्या है?
और किस बात से
वह जीने योग्य बनता है?
या फिर उद्यमिता
सिर्फ़ तनख़्वाह से बड़े
अंकों का खेल है?
तो तुम शुरुआत करना चाहते हो—
ठीक है।
पर पहले
खुद से झूठ बोलना बंद करो।
बताओ,
तुम वास्तव में क्या चाहते हो
और क्यों?
अगर यह सफ़र
सिर्फ़ अपनी छवि फुलाने के लिए है,
मूल्यांकन के गुब्बारे उड़ाने के लिए,
दोस्तों से आगे निकलने की
अदृश्य दौड़ के लिए—
तो साफ़ समझ लो,
यह कोई योगदान नहीं।
यह एक अभिशाप है।
तुम पर भी,
और उस दुनिया पर भी
जिसकी सेवा का नाटक
तुम कैमरों के सामने करोगे।
पर अगर दिल में
कुछ टूटा हुआ है
जिसे जोड़ना है,
कुछ पवित्र है
जिसे बचाना है,
और यह धरती
तुम्हें घावों से भरी दिखती है—
तो हाँ,
तब शुरू करना सार्थक है।
इस युग को उद्यमियों की ज़रूरत है—
पर चालाक नहीं,
बुद्धिमान।
पहले विवेक,
फिर कौशल।
क्योंकि विवेक हो
तो क्षमता उगाई जा सकती है,
पर विवेक बिना
हर हुनर
अज्ञान के हाथ में
एक हथियार है।
ज़रा देखो—
दुनिया थकी हुई है,
टूटी हुई है,
लालच के बोझ तले
दम तोड़ रही है।
अगर उद्यमिता का कोई अर्थ है
तो वह “मिशन” है।
करियर मूव नहीं,
पुकार।
जल्दी अमीर होने की योजना नहीं,
ना ही पेट भरकर
सप्ताहांत सजाने की तरकीब।
उद्यमिता
एक प्रेम-प्रसंग होनी चाहिए—
जीवन भर का।
ऐसा प्रेम
जो बिना मुनाफ़े भी टिका रहे,
बिना तालियों के भी,
केवल संघर्ष में भी।
क्योंकि तभी
तुम बीच रास्ते नहीं भागोगे,
तभी
अपने मूल्य नहीं बेचोगे,
तभी
खुद से गद्दारी नहीं करोगे।
उद्यमिता
खोखले जीवन को
आभूषण पहनाने का तरीका नहीं,
बल्कि
जीवन में अर्थ खोजने की
एक साधना है।





