झूठे कर्तव्यों का बोझ
अगर कर्तव्य
कंधों पर पत्थर बन जाए,
तो समझ लो—
वह कभी तुम्हारा था ही नहीं।
सच्चा उत्तरदायित्व
झुकाता नहीं,
ऊँचा उठाता है।
अधिकतर लोग
जिसे “ज़िम्मेदारी” कहते हैं,
वह दरअसल
उधार लिया हुआ आदेश है।
पूछो उनसे—
तुम्हें कैसे पता
कि यही तुम्हारा कर्तव्य है?
उत्तर में
बस एक खाली निगाह मिलेगी।
“मुझे सफल होना ही चाहिए—
यह मेरी ज़िम्मेदारी है।”
“मुझे शानदार करियर बनाना है।”
“मुझे अपना घर चाहिए।”
“मुझे बच्चों को
एक तय साँचे में ढालना है।”
पर यह “चाहिए”
आख़िर आया कहाँ से?
किसने लिखा
तुम्हारे जीवन का यह
अनिवार्य पाठ?
अगर ये ज़िम्मेदारियाँ
सच में तुम्हारी होतीं,
तो इन्हें निभाते समय
चेहरा थकान से नहीं,
आनंद से चमकता।
बोझ बन जाना ही
सबूत है
कि यह सच नहीं।
सच्चा कर्तव्य
खुशी होता है।
वह दबाता नहीं,
विस्तार देता है।
और वह
केवल आत्म-ज्ञान से जन्म लेता है।
अगर मुझे
पता हो
कि मैं कौन हूँ,
तो मुझे यह भी
पता होगा
कि मुझे क्या करना है।
यही
एकमात्र
असली ज़िम्मेदारी है।
बिना आत्म-ज्ञान के
कोई कर्तव्य
सच्चा नहीं हो सकता।
फिर भी देखो—
लोग कितने
“ज़िम्मेदार” दिखते हैं—
घड़ी के पाबंद,
समाज के आज्ञाकारी,
पर भीतर से
खाली।
कैसे संभव है यह?
क्योंकि वे
अपने नहीं,
दूसरों के कर्तव्य
ढो रहे हैं।
उधार की ज़िम्मेदारियाँ,
और
घिसा हुआ जीवन—
यही है
आधुनिक नैतिकता का
सबसे बड़ा व्यंग्य।





