रेड लाइट एरिया
(अतुकांत कविता)
यहाँ रात
दिन से पहले जाग जाती है,
और उजाले
शर्म से सिर झुका लेते हैं।
लाल बत्तियाँ
सिर्फ संकेत नहीं,
यहाँ रुकी हुई ज़िंदगियों की
धड़कन हैं।
हर दरवाज़े के पीछे
कोई कहानी है—
किसी की मजबूरी,
किसी का छल,
किसी का अधूरा बचपन।
यहाँ हँसी
सीखकर ओढ़ी जाती है,
और आँसू
मेकअप में छिपा दिए जाते हैं।
कोई माँ है
जो रोज़ अपने सपनों को
सुला देती है,
कोई बेटी
जो कभी बेटी बनकर
जी ही नहीं पाई।
यह इलाका
गुनाह से ज़्यादा
उपेक्षा का पता है,
जहाँ समाज
आँखें फेरकर
खुद को पाक समझ लेता है।
लाल बत्ती के नीचे
खड़े लोग नहीं,
खड़े हैं सवाल—
कसूर किसका है?
देह का,
या उस व्यवस्था का
जो देह से पहले
आत्मा खरीद लेती है।
अगर कभी
इस रास्ते से गुज़रो,
तो घृणा नहीं,
थोड़ी-सी इंसानियत
साथ ले जाना—
शायद
किसी की रात
कम अँधेरी हो जाए।





