Half and Half Is a Quarter
(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद)
अकेलेपन से जन्मे रिश्ते
पूरा नहीं करते—
वे
आधेपन को
सिर्फ
दूसरे आधे से
ढक देते हैं।
अधिकतर रिश्ते
सम्पूर्णता से नहीं,
कमी से शुरू होते हैं।
मैं तुम्हें चाहिए,
तुम मुझे चाहिए—
यह मिलन नहीं,
यह समझौता है।
मैं तुम्हारी चाह पूरी करूँगा,
तुम मेरी।
लेन-देन की
इस चुप डील को
हम
प्रेम कह देते हैं।
और जिस दिन
कोई
काम का नहीं रहता—
न भावनात्मक,
न शारीरिक,
न सामाजिक—
उसी दिन
रिश्ता
भारी लगने लगता है।
स्नेह
धीरे-धीरे
खिसक जाता है,
क्योंकि
वह कभी
प्रेम था ही नहीं।
वह
सौदा था।
रिश्ते
सुंदर हो सकते हैं—
पोषक,
विस्तृत,
यहाँ तक कि
पवित्र भी।
पर सिर्फ तब,
जब हम
उनमें
स्वार्थ न मिलाएँ।
जब सामने वाला
हमारी
संतुष्टि का
औज़ार न बने।
अगर कोई
तुम्हारे जीवन में
सिर्फ इसलिए है
कि वह
तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करे,
तो वहाँ
प्रेम नहीं हो सकता।
वहाँ
आसक्ति होगी,
निर्भरता होगी,
शायद जुनून भी—
पर
प्रेम नहीं।
रिश्ते बनाओ—
खूब बनाओ—
पर
अंदर की
समृद्धि से।
अपने खोखलेपन को
दूसरे से
मत भरवाओ।
अपनी चोटों पर
किसी इंसान को
पट्टी मत बनाओ।
यह प्रेम नहीं,
यह डर है—
जो निकटता का
मुखौटा पहन लेता है।
यह अकेलापन है—
जो
संगति का
भेष धर लेता है।
रिश्ते
लालसा से नहीं,
स्पष्टता से उपजने दो।
दर्द से भागने के लिए नहीं,
आनंद को बाँटने के लिए।
तभी
वे असली बनते हैं।
तभी
वे मुक्त होते हैं।





