लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ
किसी कमरे में
काफी देर रह लो,
तो कमरा
अपना लगने लगता है।
कमीज़ पहनो
कुछ समय तक,
गाड़ी चलाओ
बरसों—
और
पहचान
जुड़ जाती है।
ताँबा और जस्ता
साथ पड़े रहें,
तो
आपस में
घुलने लगते हैं।
क्या
इसे
प्रेम कहोगे?
लगाव
अच्छा लगता है,
सुकून-सा देता है।
पर
ज़रा शांति से
देखो—
उसके साथ
डर आता है,
हिंसा आती है,
लालच,
भ्रम,
ऊब,
अकेलापन,
शक—
सब
एक साथ।
लगाव
प्रेम जैसा
लगता है,
पर
क्या वह
हमेशा
अपने बारे में
नहीं होता?
जहाँ
मैं केंद्र में हो,
वहाँ
प्रेम कैसे होगा?
जिस नरक को
हम
प्रेम का नाम देकर
झेलते हैं,
वह
अक्सर
प्रेम से नहीं,
लगाव से
उत्पन्न होता है।
लगाव
मीठा है,
पर
उसके साथ आने वाला
दर्द
असहनीय।
यदि
उस पूरे बोझ से
छुटकारा चाहिए,
तो
लगाव की
खतरनाक
खोखलाहट
देखनी होगी।
फिर
एक ही रास्ता
बचता है—
प्रेम।
अजीब है—
हमने
प्रेम के नाम पर
सब कुछ
आज़माया,
सिवाय
प्रेम के।
क्या
प्रेम को
एक मौका दें?
नहीं।
प्रेम
कोई विचार नहीं,
कोई प्रयोग नहीं—
वह
एक अवस्था है
जिसे
जिया जाता है।





