स्क्रिप्ट के बाहर घटता प्रेम
प्रेम
स्वाभाविक नहीं है।
स्वाभाविक है
जंगल—
सीमा खींचना,
कब्ज़ा करना,
हार्मोन का शोर।
यही
जंगल-प्रेम है—
जो सहज आता है,
और
आसानी से
हिंसक हो जाता है।
सच्चा प्रेम
वहाँ शुरू होता है
जहाँ
जंगल पार किया जाए,
जहाँ
समाज की सिखाई हुई
परिभाषाएँ
भुला दी जाएँ।
जितना स्पष्ट
तुम
अपनी कंडीशनिंग देखते हो,
उतना ही कम
दूसरों से
चौंकते हो।
हम
व्यक्ति नहीं हैं,
हम
स्क्रिप्ट हैं—
प्रशिक्षित,
प्रोग्राम किए हुए,
पूर्वानुमेय।
पर
क्योंकि
हम अपनी ही
स्क्रिप्ट नहीं देखते,
इसलिए
जीवन
हमें चौंकाता रहता है।
हम पूछते हैं—
वह ऐसा कैसे कर सकता है?
वह इतनी बदल कैसे गई?
पर
जो यथार्थ में है,
वह
आश्चर्य नहीं करता।
स्क्रिप्ट
स्क्रिप्ट की तरह
चलती है—
बस।
तुम समझते रहे—
तुम एक स्त्री से
मिल रहे हो।
नहीं—
वह एक स्क्रिप्ट है।
वह समझती रही—
वह एक पुरुष से
जुड़ी है।
नहीं—
तुम भी
एक स्क्रिप्ट हो।
यह
रिश्ता नहीं,
यह
पैटर्नों की
टक्कर है।
और
जब तक
स्क्रिप्ट चल रही है,
प्रेम के लिए
कोई जगह नहीं।
प्रेम की संभावना
तभी खुलती है
जब
स्क्रिप्ट रुके,
उस पर प्रश्न उठे,
उसे
धीरे-धीरे
खोला जाए,
तोड़ा जाए।
प्रेम
स्क्रिप्ट में नहीं होता—
प्रेम
तभी घटता है
जब
स्क्रिप्ट से
बाहर आया जाए।





