व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से?
हम
लोगों से प्रेम नहीं करते,
हम
अपनी ही कल्पनाओं के
भूतों से प्रेम करते हैं—
जब तक
यथार्थ
बुलबुले को
फोड़ नहीं देता।
देखो—
अनुभव
हर दिन
हमें कैसे
छलता है।
वह सामने खड़ी है,
और तुम
कसम खाते हो—
दुनिया की
सबसे सुंदर स्त्री है।
यह
उसका सौंदर्य नहीं,
तुम्हारी
दृष्टि का
भ्रम है।
हम
आत्म-छल में
डूबे रहते हैं।
यहाँ तक कि
जब हम सोचते हैं
कि
साधारण लोगों को
देख रहे हैं,
तब भी
हम
प्रतिबिंबों को
घूर रहे होते हैं।
भूत।
दिन-दहाड़े
भ्रम।
इसे ही
कहते हैं—
सत्य में नहीं जीना।
तथ्य में नहीं,
केवल
प्रतीति में।
खोखले
इंद्रिय-चित्र,
मन के
मृगतृष्णा।
भूत क्या है?
जो
है नहीं,
पर
दिखता है।
इस अर्थ में
तुम्हारा प्रिय भी
एक भूत है—
क्योंकि
जिससे तुम
प्रेम का दावा करते हो,
वह
वास्तव में
वह नहीं है।
वह
एक छवि है—
जिसे तुमने
सावधानी से
गढ़ा है।
एक ऐसी छवि
जो
अहंकार को
सहला दे,
डर को
शांत कर दे,
असुरक्षा को
सहारा दे।
तुम
छवि की पूजा करते हो,
व्यक्ति से
बचते हो।
पर
भ्रम
हमेशा नहीं छिपता।
जिस दिन
निकटता बढ़ती है,
और
कल्पना के पीछे
वास्तविक मनुष्य
दिखने लगता है—
घर्षण शुरू होता है।
फिर
मोहभंग।
फिर
पीड़ा।
बुलबुला
फूटता है।
और
वह
दुख देता है।
इसलिए—
बुलबुलों में
जीने की
आदत मत डालो।
वे
हमेशा
फूटते हैं।
और
दर्द
हमेशा
सच ही होता है।





