Missing the Obvious
(स्पष्ट को चूक जाना)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)
तुम
किसी रहस्य से वंचित नहीं हो—
तुम
स्पष्ट को ही
देख नहीं रहे।
जो ठीक
तुम्हारे सामने घट रहा है,
वही
नज़र से फिसल जाता है।
किसी को
नमस्ते कहना,
दफ़्तर तक
चलते जाना,
किसी की
यूँ ही कही बात—
सब
तुम्हें बहा ले जाते हैं,
बिना प्रतिरोध।
घटनाएँ
तुम्हारी अनुमति के बिना
भीतर घुस आती हैं—
और तुम
उन्हें
सत्य मान लेते हो।
इतनी साधारण चीज़ें
हमें इतनी आसानी से
कैसे धोखा दे देती हैं?
क्योंकि
हम
वास्तव में
उपस्थित ही नहीं होते।
हम
वस्तुओं को
जैसा वे हैं
वैसा नहीं देखते।
लोगों को
जैसा वे हैं
वैसा नहीं सुनते।
हम
यहाँ नहीं होते—
हम
कहीं और होते हैं।
भीतर की
उलझनों में,
पुरानी स्मृतियों में,
सीखे हुए प्रभावों में।
हम
हर दृश्य को
स्मृति की छलनी से छानते हैं—
इसलिए
जो अभी घट रहा है,
वह
पृष्ठभूमि के शोर में
डूब जाता है।
हमारी प्रतिक्रियाएँ
वर्तमान से नहीं,
इतिहास से निकलती हैं।
यह अंधापन
घटनाओं की
जटिलता से नहीं है—
यह
सीधे देखने से
हमारे इनकार से है।
देखना
कोई कठिन साधना नहीं।
वह
इतना सरल है
कि मन
उससे चिढ़ जाता है।
उसे लगता है—
इतना नंगा,
इतना सीधा—
यह कैसे सत्य हो सकता है?
हम
किसी तकनीक की
आशा करते हैं,
किसी गुप्त मंत्र की,
किसी रहस्य की।
पर सत्य
छिपता नहीं—
वह
बस
चिल्लाता नहीं।
वह
यहीं है,
अभी है—
और
मानना या न मानना
तुम पर है।
शुद्ध अवलोकन से
सरल कुछ नहीं—
मान्यता के बिना
देखना,
एजेंडा के बिना
सुनना,
डर के बिना
महसूस करना।
यह
कुछ माँगता नहीं—
बस
ईमानदारी।
और
इसीलिए
इसके परिणाम
असाधारण होते हैं।
तुम
रहस्य खोजते रहे—
और
स्पष्ट
तुम्हारे सामने
मुस्कुराता रहा।
अब
अगर देख सको—
तो
सब
यहीं है।





