सामूहिक मूर्खता की ताक़त

सामूहिक मूर्खता की ताक़त
(अतुकांत कविता)

जब सच
मतों से तय होने लगे,
समझ लो
सच हार चुका है।

एक मूर्ख
हँसी बनता है,
लाख मूर्ख
इतिहास।

भीड़
गलत को
सही बना देती है,
और सही को
ख़तरा।

झूठ
अकेला नहीं चलता—
वह
नारे चाहता है,
झंडे चाहता है,
तालियाँ चाहता है।

सच
चुप रहता है,
अकेला खड़ा रहता है—
बिना मंच,
बिना समर्थन।

आज
मूर्खता
गलती नहीं रही,
संस्था बन गई है।

अब
प्रश्न पूछना
अपराध है,
सोचना
देशद्रोह।

भीड़ कहे—
तो छेद फैशन हैं,
शोर कहे—
तो अंधापन दृष्टि है।

और जो देख ले
कि राजा नंगा है—
वही
सबसे बड़ा दोषी।

यही
सामूहिक मूर्खता की शक्ति है—
जो
झूठ को सिंहासन देती है,
और
सत्य को
अल्पमत में
धकेल देती है।
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