“असुरक्षा की गोद में गपशप”
गपशप
एक आग है
जिसमें सच नहीं जलता,
डर सुलगता है।
दो लोग फुसफुसाते हैं—
तीसरा जुड़ जाता है,
फिर चौथा,
फिर भीड़।
कोई सवाल नहीं पूछता—
क्यों?
किसलिए?
यहाँ जुड़ाव
अर्थ से नहीं बनता,
शोर से बनता है।
मैं भी बोल दूँ
कुछ भी—
तो मैं भी हूँ।
मैं भी अपना हूँ।
यही प्रमाण है
इस झूठे परिवार का।
सन्नाटा डराता है,
क्योंकि सन्नाटे में
मैं हूँ—
नंगा,
अकेला,
बिना सहारे।
इसलिए लोग
शब्द उछालते हैं
जैसे तकिए—
ताकि भीतर की खाली जगह
दिख न जाए।
जो चुप हो जाए,
जो अर्थ खोज ले—
वह बाहर कर दिया जाता है।
क्योंकि सच
भीड़ में फिट नहीं बैठता।
गपशप
बंधन नहीं,
पट्टी है—
असुरक्षा के घाव पर।
और जो पट्टी हटा दे,
उसे
स्वतंत्रता मिलती है—
पर पहले
अकेलापन।





