“अपने आप को दूसरा जन्म दो”
पहला जन्म
माँ की कोख से होता है—
शरीर मिलता है,
नाम मिलता है,
पर मैं कौन हूँ
यह नहीं मिलता।
बच्चा रोता है,
भूख लगती है,
डर लगता है—
यह प्रकृति सिखाती है।
पर बड़ा होकर भी
अगर आदमी
सिर्फ़
भूख, डर और लालच में
ही जीता रहे—
तो जन्म अधूरा है।
एक उदाहरण देखो—
एक बच्चा
खिलौना छिनते ही
मारने दौड़ पड़ता है।
अगर बड़ा होकर भी
वह
पद, पैसा, प्रतिष्ठा छिनते ही
हिंसक हो जाए—
तो क्या बदला?
सिर्फ़ खिलौना महँगा हो गया।
दूसरा उदाहरण—
एक युवक
परीक्षा में फेल होता है,
और सोचता है—
“मैं बेकार हूँ।”
अगर शिक्षा ने
उसे यह नहीं सिखाया
कि असफलता घटना है, पहचान नहीं—
तो डिग्री मिली,
जन्म नहीं।
पहला जन्म
हमें प्रवृत्तियाँ देता है—
क्रोध,
ईर्ष्या,
वासना,
डर।
दूसरा जन्म
हमें दृष्टि देता है—
इन सबको
देख पाने की क्षमता।
एक आदमी
गाली सुनकर
तुरंत गाली देता है—
यह पहला जन्म है।
वही आदमी
गाली सुनकर
अपने भीतर उठते क्रोध को देख ले—
और चुप रह जाए—
यहीं
दूसरे जन्म की
पहली साँस होती है।
शिक्षा
सिर्फ़ नौकरी का रास्ता नहीं,
यह
भीतर की जेल का नक्शा है।
जो पढ़-लिखकर भी
भीड़ की सोच से
डरता रहे—
वह शिक्षित नहीं,
प्रशिक्षित है।
दूसरा जन्म
किसी मंदिर,
किसी किताब,
किसी गुरु से
नहीं होता—
वह होता है
उस दिन
जब आदमी
खुद से पूछता है—
“जो मैं हूँ,
क्या वही हूँ
जो समाज ने कहा?”
पहले जन्म से
हम जीव होते हैं।
दूसरे जन्म से
हम मनुष्य होते हैं।
और जो
दूसरा जन्म नहीं लेता,
वह
जीता है…
पर जागता नहीं।





