जब सफलता स्वयं को असफल कर दे

“जब सफलता स्वयं को असफल कर दे”

हम कहते हैं—
मैं आगे बढ़ रहा हूँ।
तनख़्वाह बढ़ी,
पहचान बढ़ी,
अनुभव जुड़ते गए।

पर किसी ने नहीं पूछा—
किसके लिए?

जिसके लिए
दिन-रात दौड़े,
वही भीतर
और थक गया।

पैसा जमा हुआ
जैसे अलमारी में कपड़े,
पर मन
नंगा ही रहा।

डिग्रियाँ आईं,
सम्मान मिला,
पर नींद
और हल्की हो गई।

अगर यह विकास है,
तो फिर
घबराहट क्यों बढ़ी?

हम जो कुछ भी कमाते हैं—
नाम, ज्ञान, ताक़त—
सब अपने लिए ही तो है।

तो फिर
अगर मैं ही बेहतर नहीं हुआ,
तो यह सब
किस काम का?

हम भीतर से
खाली पैदा नहीं होते,
अव्यवस्थित पैदा होते हैं।
डर,
लालच,
अज्ञान—
बीज पहले से पड़े होते हैं।

समाज
उन पर खाद डाल देता है।

भीतर की वृद्धि
जोड़ने से नहीं होती,
घटाने से होती है।

कम डर,
कम भ्रम,
कम दिखावा।

जो बाहर बढ़ता है
पर भीतर नहीं सँवरता,
वह सफल नहीं—
बस व्यस्त है।

और जो भीतर हल्का होता जाता है,
वह
कम में भी
समृद्ध हो जाता है।

सफलता का असली प्रश्न
यह नहीं है—
कितना पाया?

सवाल यह है—
क्या पाने के बाद
मैं शांत हूँ?

अगर नहीं,
तो समझ लो—
सफलता
स्वयं से
असफल हो गई।
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