ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द

“ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द”

ईर्ष्या
किसी और से नहीं होती,
ईर्ष्या
खुद से होती है—
जब खुद
उधार का हो।

मैं नहीं जानता
मैं कौन हूँ,
तो
तुमसे पूछता हूँ।

तुम कहते हो—
“तुम बहुत अच्छे हो,”
और मैं
अच्छा हो जाता हूँ।

मेरी पहचान
तुम्हारे मुँह में
लटक जाती है।

पर उसी मुँह से
जब तुम
किसी और की
तारीफ़ कर देते हो,
तो
कुछ भीतर टूट जाता है।

क्योंकि
जिस स्रोत से
मैं मैं था,
वह
अब किसी और को
रोशन कर रहा है।

यही
ईर्ष्या है।

अगर मैं
सच में जानता होता
कि मैं क्या हूँ,
तो
तुम्हारी तारीफ़
मेरी साँस नहीं होती।

और तुम्हारी
तारीफ़ किसी और की—
मुझे
डरा नहीं सकती।

ईर्ष्या
प्रतिस्पर्धा नहीं,
पराधीनता है।

यह दर्द है
अपने ही
मालिक न होने का।

जो
दूसरों की स्वीकृति पर
जीता है,
वह
दूसरों की खुशी से
जलता है।

जिस दिन
मैं खुद को
सीधे देख लेता हूँ—
बिना आईने,
बिना तालियों—

उस दिन
ईर्ष्या
भूखी रह जाती है।

स्वतंत्र मन
तुलना नहीं करता।

और जो
अपना स्वामी है,
वह
कभी
ईर्ष्यालु नहीं होता।
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