“प्रेम आत्मा का प्रतिबिंब है”
तुम कहते हो—
मैं यह हूँ,
मैं वह हूँ।
पर हर वाक्य से पहले
एक शब्द
खड़ा रहता है—
मैं।
नाम बदलते रहते हैं,
पद बदलते रहते हैं,
पर यह मैं
वहीं रहता है।
यही
स्वयं है।
जीवन की गुणवत्ता
घरों, रिश्तों,
सुविधाओं से नहीं—
इस मैं की
स्वच्छता से तय होती है।
अगर स्वयं साफ़ है,
तो
संबंध सहज होते हैं।
अगर स्वयं उलझा है,
तो
प्रेम भी
शर्तों में बहता है।
डर से भरा मन
माँग करता है।
असुरक्षित मन
कब्ज़ा चाहता है।
और साफ़ मन
बस
प्रेम करता है।
तुम गहरा प्रेम चाहते हो?
तो
खुद को साफ़ करो।
तुम निर्भय होना चाहते हो?
तो
खुद को साफ़ करो।
यह सफ़ाई
कोई और नहीं करेगा।
न गुरु,
न साथी,
न समय।
यह काम
स्वयं को ही
करना होगा।
कैसे?
देखकर।
जब क्रोध उठे—
देखो।
जब लालच खिंचे—
देखो।
जब डर काँपे—
देखो।
भाव,
विचार,
शब्द,
हाव-भाव—
सब
स्वयं की गतिविधियाँ हैं।
जब तुम
उन्हें बिना पक्षपात
देखते हो,
तो
मन की हालत
खुद उजागर हो जाती है।
और यही
देखना
उपचार बन जाता है।
स्वयं के लिए
रोग-निदान ही
औषधि है।
सुंदरता
संयोग से नहीं आती।
महानता
मुफ़्त नहीं मिलती।
उसकी कीमत
जागरण है,
अभ्यास है,
ईमानदार दृष्टि है।
महान संबंध
पहले
महान स्वयं
माँगते हैं।
और स्वयं को जानने का
कोई मार्ग नहीं—
सिवाय
खुद को
देखते रहने के।
यही
आधार है।
यही
एकमात्र मार्ग है—
बिना मार्ग का मार्ग।





