घाव इकट्ठा करना बंद करो
कोई तुम्हें
अंदर से चोट नहीं पहुँचा सकता
जब तक तुम
उसे अनुमति न दो।
लोग चोट पहुँचा सकते हैं,
पर नुकसान उतना नहीं
जितना तुम
उसे सीने से लगाकर
खुद कर लेते हो।
घटना बाहर घटती है,
पर तुम उसे
पहचान बना लेते हो।
यही असली हिंसा है।
दुनिया दरवाज़ा खटखटाती है—
खरोंचती है,
धक्का देती है—
पर केंद्र तक
वह नहीं पहुँच सकती
जब तक तुम
दरवाज़ा खोल न दो।
जो ठीक से जी रहा है,
उसका सार
अछूता रहता है।
उसके भीतर
कोई घुसपैठ नहीं।
दर्द को
उसकी जगह पर रखो—
और वह जगह
कभी भी
तुम्हारा हृदय नहीं है।
कुछ गंदा लगे
तो क्या करते हो?
धो देते हो।
आगे बढ़ जाते हो।
पर भावनात्मक गंदगी को
तुम बोतल में भरकर
साथ ढोते हो—
जैसे कोई
कीमती इत्र हो।
धोखा
गुलाब नहीं महकाता,
वह सड़ांध देता है।
फिर उसे
यादों की अलमारी में
सजाकर क्यों रखते हो?
क्यों विश्वासघात को
स्मृति-वस्तु बनाते हो?
क्यों पीड़ा को
व्यक्तित्व में बदलते हो?
छोड़ दो।
चल पड़ो।
जीवन
पुराने घावों का संग्रहालय नहीं है।
यह शिकायतों की प्रदर्शनी नहीं।
जीवन
ताज़गी माँगता है।
स्पष्टता चाहता है।
अतीत को
वहीं सड़ने दो
जहाँ उसका स्थान है।
वर्तमान के
पवित्र कक्ष में
उसे मत लाओ।





