प्लमकेक या सत्य?
थोड़ा-सा दुख आए
तो
कोई प्लमकेक पकड़ा देता है।
कोई तोहफ़ा,
कोई सैर,
कोई ध्यान-भटकाव।
आँसू सूख जाते हैं—
समाधान से नहीं,
प्रतिस्थापन से।
दुख गया नहीं,
बस
मन बहला दिया गया।
यही है
सभ्य दुख का इलाज—
रो लो थोड़ा,
फिर मुस्कुरा लो।
कई बार
दुख इसलिए भी आता है
क्योंकि
तुम्हें प्लमकेक चाहिए।
ध्यान चाहिए।
सांत्वना चाहिए।
यह दुख
परिवर्तन नहीं करता,
यह माँग करता है।
यह अहंकार की
एक और चाल है।
पर जब
तुम सच में
मुक्त होना चाहते हो—
केवल दुख से नहीं,
पूरे सुख-दुख के
चक्र से—
तब पीड़ा
तीखी हो जाती है।
वह सहारा नहीं माँगती।
वह सच माँगती है।
यह दर्द
भावनाओं को नहीं,
शरीर को नहीं—
अहंकार को चीरता है।
और उसी
चीरे में
स्वतंत्रता छुपी होती है।
यह राहत नहीं है।
यह आराम नहीं है।
यह मुक्ति है।
हाँ,
इसमें भी दर्द है।
घाव लगता है।
पर यह घाव
साफ़ है।
ईमानदार है।
इसे जियो।
पीछे मत हटो।
प्लमकेक मत उठाओ।
सांत्वना पर
सौदा मत करो।
क्योंकि
प्रेम
इस घाव के योग्य है।
और यह घाव—
यदि सही तरह
स्वीकार किया जाए—
तो
स्व से बहुत आगे
जाने का
द्वार बन जाता है।





