तुम अपने दुख की सहमति देते हो

तुम अपने दुख की सहमति देते हो

चुनाव!
तुम असहाय नहीं हो।
बहाए नहीं जा रहे—
तुम चल रहे हो।

कुछ भी
तुम पर घटित नहीं होता
बिना तुम्हारी
मौन अनुमति के।

दुख आता है
और तुम
किसी को ढूँढते हो—
दोष देने के लिए।
व्यक्ति, परिस्थिति,
भाग्य, समय।

पर स्वतंत्रता
बिना जिम्मेदारी
कभी मिली है?

जो दुख भोग रहा है,
सबसे बड़ा हित
उसी का है—
उसे समाप्त करने में।

घटना
बाहर घटती है।
दर्द
बाहर से आता है।

पर दुख?
वह भीतर बनता है।

दर्द
अनियंत्रित हो सकता है,
दुख
नहीं।

दुख
कोई अनिवार्यता नहीं—
वह एक विकल्प है।

तुम
बिना सहमति के
दुखी नहीं हो सकते।
सच यह है—
बिना सक्रिय भागीदारी के
दुख टिक ही नहीं सकता।

यह अटपटा लगता है—
कौन दुख चुनता है?

पर हमने
दुख को
गुण बना लिया है।

दुख
सहानुभूति दिलाता है।
दुख
नैतिक ऊँचाई का
भ्रम देता है।
दुख
कभी-कभी
इनाम भी दिलाता है—
भावनात्मक,
सामाजिक।

रोता चेहरा
अधिक योग्य लगता है
हँसते चेहरे से।

और जहाँ
आँसू पुण्य बन जाएँ,
वहाँ
मुस्कानें
दुर्लभ हो जाती हैं।

दुख
भाग्य नहीं है।
यह
एक दुर्भाग्यपूर्ण
चयन है।

स्वतंत्रता
उसी क्षण शुरू होती है
जब तुम
यह स्वीकार कर लेते हो—

मैं दुखी हूँ
क्योंकि
मैंने इसे चुना है।

Scroll to Top