यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा?

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा?

तुम अपने बारे में
जो सोचते हो—
क्या वही
वास्तव में
तुम हो?

हम अहंकार को
अकड़ समझ लेते हैं।
किसी का सीना तना देख
कह देते हैं—
इसे अहंकार है।

पर अहंकार
इतना सतही नहीं।

अहंकार है—
“मैं हूँ।”

और
जिसके साथ
तुम इस “मैं हूँ” को
जोड़ देते हो,
वही
अहंकार बन जाता है।

“मैं महान हूँ”—
अहंकार।
“मैं कमजोर हूँ”—
अहंकार।

“मैं पीड़ित हूँ”—
अहंकार।
“मैं विनम्र हूँ”—
अहंकार।

अच्छा, बुरा,
सुंदर, कुरूप—
जो भी
मैं अपने बारे में
मान लेता हूँ,
सब
अहंकार ही है।

मैं
वह नहीं हूँ
जो मैंने
खुद के बारे में
कल्पना की है।

पहचानें
उठाई हुई हैं।
उधार ली हुई हैं।

परिवार
मैंने नहीं चुना।
लिंग
मैंने नहीं चुना।
धर्म
मैंने नहीं चुना।

फिर भी
धीरे-धीरे
यही सब
“मैं” बन गया।

जो बाहर से आया,
वह
मेरा कैसे हुआ?

यदि मेरा अस्तित्व
उन चीज़ों पर टिका है
जो मैंने कभी चुनी ही नहीं—
तो
वह अस्तित्व
मेरा कैसे है?

जन्म-स्थान
संयोग था।
त्वचा का रंग
संयोग।
स्वभाव भी
काफी हद तक
संयोग।

यह उम्र भी
मैंने नहीं चुनी।

और यदि
मैं इन सबसे
खुद को जोड़ता हूँ—
तो
मैं अहंकार से
जुड़ा हूँ।

अब
सबसे कठिन प्रश्न—

यदि ये सब
छोड़ दिए जाएँ,
तो
लगभग
पूरी ज़िंदगी
गायब हो जाती है।

और
यहीं
डर पैदा होता है।

एक गहरा,
अस्तित्वगत डर—
क्योंकि
जब “मैं” समझी गई
सब चीज़ें
ढहती हैं,
तो लगता है
मैं ही
ढह रहा हूँ।

तो पूछो—

यदि
सब चला जाए,
तो
क्या बचेगा?

केवल
तुम।

पर वह
“तुम”
कौन हो?

रोचक है न?

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