प्रोग्राम की गई भावनाएँ

प्रोग्राम की गई भावनाएँ

भावनाएँ
जन्मजात नहीं होतीं—
वे
संस्कारों की भाषा हैं।

सोच
जैसे
मानसिक ढर्रों से
उगती है,
वैसे ही
भाव
शरीर और समाज की
जमी हुई
लकीरों से
फूटते हैं।

भाव उठे
उससे पहले ही
रसायन
अपना काम
शुरू कर चुके होते हैं।

हार्मोन
घंटी बजा देते हैं—
और मन
नाम दे देता है।

भावना
सोच से
गहरी लगती है
क्योंकि
उसमें
देह का वजन है।

इसीलिए
वह
अपरिहार्य,
पवित्र,
“दिल से निकली”
महसूस होती है।

पर
यह भ्रम है।

क्रोध,
भय,
कामना,
आसक्ति—
ये
जंगल की विरासत हैं।

हर पशु
इन्हें जानता है।
हम भी।

शरीर
ईंधन देता है,
समाज
दिशा।

कोई
शवयात्रा में रोता है,
कोई
क्रिकेट मैच में।

उत्तेजक बदलता है,
संरचना वही रहती है।

संस्कार
पहचानने का
एक ही उपाय है—
ध्यान।

भाव उठते हुए
देखो।
उनकी चाल,
उनका स्रोत,
उनकी पकड़।

देखते ही
वे
ढीले पड़ने लगते हैं।

और
जब संस्कार
कमज़ोर पड़ते हैं,
तो
संवेदना मरती नहीं—
जागती है।

भावनाओं से
मुक्ति
सुन्नता नहीं है।
वह
ताज़गी है।

तब
धूप
त्वचा पर
महसूस होती है।
अजनबी की आवाज़
सुनी जाती है।
खामोशी
दिखाई देती है।

तुम
कम भावुक,
पर
ज़्यादा जीवित
हो जाते हो।

भावनाएँ
बासी हैं।
तुम्हें पहले से पता है—
किस पर
गुस्सा आएगा,
किस पर
आँसू।

सब
प्रोग्राम है।

संवेदनशीलता
कुछ और है।

वह
ताज़ा होना है।
बिना फ़िल्टर,
बिना अनुमान
जीवन से
छू जाना।

जैसे
सुबह
ठंडा पानी
चेहरे पर—

जाग्रत।
उपस्थित।
स्पष्ट।

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